“स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन” बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के ऐसे प्रेरणादायक वचनों का संकलन है, जिन्हें उनके साथ रहने वाले श्रद्धालुओं ने समय-समय पर लिखकर सुरक्षित रखा। पुस्तक में दिए गए प्रत्येक वचन के साथ संबंधित तारीख भी दी गई है। इन वचनों में जीवन, गुरु-भक्ति, साधना, सदाचार और मानव जीवन के लिए उपयोगी अनेक संदेश मिलते हैं।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
पुस्तक: स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
प्रकाशक: अन्तर-ध्वनि संस्थान, मथुरा

स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
14 मार्च 1995 से 20 मार्च 1995 तक
बिना मतलब तुम घर से बाहर मत निकलो और दूसरी बात यह है कि किसी के साथ वाद-विवाद में मत पड़ो।
हिन्दू मुसलमान छोट बड़े सब एक दूसरे का साथ दो और प्यार मुहब्बत से रहो आगे समय बहुत ही खराब आ रहा है।
तुम इस बार मेहनत कर दो फिर आगे तो ताज है। दूबले के सिर पर सेहरा तो एक ही बार रखा जाता है।
जो दूसरों की निन्दा और आलोचना करते रहते हैं वे भजन नहीं कर सकते। महात्माओं ने कहा है निन्दा करने से पाप कर्म चढ़ते हैं, जिसकी निन्दा की जाती है वो हल्का हो जाता है। निन्दक अपने लिए नरक का दरवाजा खोल देता है।
सत्संगी जब अपने अंतर में तारा मण्डल, सूर्य चाँद और दैविक मण्डलों में देवी देवताओं को देखता है, उनसे बातें करता है तो इन सब बातों को किसी से कहना नहीं चाहिए। उसे केवल गुरु को ही बताना चाहिए। गुरु का यही आदेश है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
14 नवम्बर 1995 से 20 नवम्बर 1995 तक
फकीर ही खुदा की जाति की तस्वीर है। वे खुदा से मिले हुए होते हैं। उनकी दया मेहर हो जाय तो एक क्षण में कुछ का कुछ हो सकता है।
जो शक्तियां ऊपर के मण्डलों से इस पृथ्वी पर आई हैं वो अब मैदान में उतरने वाली हैं। उनका काम होगा अधर्मियों का विनाश करना और धर्म की स्थापना करना।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
7 मार्च 2000 से 13 मार्च 2000 तक
जब मैंने पहले ‘जयगुरुदेव’ का नाम उच्चारण किया तो लोग हमको कहने लगे कि ये पागल हो गये। पागल तो वो खुद थे। तुम्हारी किताबों में लिखा है—
गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः, गुरुः देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।।
गुरु ने जो कह दिया उसे करो। यह सोचो कि उसमें कोई राज है। वह जो कहे उसे तो करो लेकिन वह जो करें उसे कभी मत करो क्योंकि तुम समझ नहीं पाओगे, चक्कर में फँस जाओगे। वैसे तो एक बार किसी बात को मना कर दिया जाय तो मान लेना चाहिए, पर दो-तीन बार जोर देकर कहा जाय तब तो यही सोचना चाहिए कि कोई बात होगी तभी ऐसा कह रहे हैं।.
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
गुरु महाराज की दया और कृपा
गुरु महाराज की ऐसी दया और कृपा थी कि अगर एक आदमी से मैंने मेहनत शुरू की और आज तो हजारों-लाखों हैं, पर कुछ नहीं। जैसे पहले मेहनत करता वैसे ही अब भी मेहनत करता हूँ।

स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-भजन के लिए समय
तुम भजन के लिए समय दो तो देखें कैसे तुम्हारी जीवात्मा की आँख नहीं खुलती है, कान नहीं खुलते हैं।
तन से, मन से और धन से बुरा काम मत करो। कर्म बुरा नहीं करोगे तो अच्छे विचार आएँगे। अगर तुमने तन-मन गुरु को दे दिया तो काम बन जाएगा।
एक लाख नहीं, एक करोड़ गुरु कर लो, जब तक चेतन गुरु नहीं मिलेगा जीवात्मा ऊपर के दैविक मण्डलों में कभी नहीं जा सकती।
महात्मा छोटा बनकर सबको उठाते हैं, बड़ा बनकर कोई भी जीवों को नहीं उठा सकता।
महात्माओं की वजह से सब मामला रुका पड़ा है। यह हम आपको बता देते हैं, नहीं तो अब तक कुछ का कुछ हो गया होता।
सच्चा अमृत काया के अन्दर है, जिसमें स्नान करने से जीव जन्म-मरण से मुक्त होता है। ईश्वर धाम से ऊपर और ब्रह्म-धाम से भी ऊपर मानसरोवर है, जहाँ जीव नहाती है। करोड़ों सूर्यों का प्रकाश वहाँ के प्रकाश के सामने कुछ नहीं। इस नर देही में वहाँ का अक्स पड़ता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-जो मुक्ति प्रदान करने वाला नाम है वह इन छः चक्रों में नहीं है।
दोनों आँखों तक पिण्ड है और यहाँ तक ही छः चक्र हैं। जो मुक्ति प्रदान करने वाला नाम है वह इन छः चक्रों में नहीं है। पहले चक्र यानी मूल चक्र (गुदा चक्र) में गणेश जी बैठे हैं। ये सबसे नीचे के देवता हैं। इससे आगे इन्द्रिय चक्र में ब्रह्माजी हैं, फिर नाभि चक्र में विष्णु जी हैं। हृदय चक्र में शिव और कण्ठ चक्र में शक्ति का वासा है। उसके आगे दोनों आँखों के पीछे जीवात्मा बैठी है। ये जितने देवी-देवता हैं, सब आत्मा से ताकत लेते हैं।
जो दुनिया का परमेश्वर है, परमात्मा ईश्वर है, वह काल है। उसे काल भगवान कहा जाता है। जिसको दुनिया पूजती है वह लोगों को खाता है। उसमें कोई रहम नहीं। सारा संसार काल के जाल में फँसा हुआ है।
कलयुग का समय अभी पूरा नहीं हुआ है। उसका प्रथम चरण है, किन्तु प्रथम चरण में ही पाप इतना बढ़ा हैकि महात्माओं ने युग परिवर्तन की मौज की। इसी कलयुग में सतयुग आएगा और कलयुग जाएगा कुछ हजार वर्षों के लिए। उसके बाद फिर कलयुग लग जाएगा।
मरते वक्त यदि इंसान की भावना अथवा आशा धन में, सम्पत्ति में रहती है तो मृत्यु के पश्चात उसे पहले साँप की योनि मिलती है।
मुक्ति सन्तों के दर्शन करके तर जाती है। सन्त मुक्ति को कुछ नहीं समझते। तुम मुक्ति की तलाश करते हो। मुक्ति यहाँ तो है नहीं। यह तो स्वर्ग, वैकुण्ठ, ईश्वर और ब्रह्मा के ऊपर में है।
मन के अन्दर बहुत विकार उत्पन्न होते रहते हैं। युगों-युगों तक इन्द्रियों के दरवाजे पर बैठकर इसने विकार जमा कर रखे हैं, इसलिए सुमिरन, ध्यान, भजन के वक्त झट से भाग जाता है। नियम से बैठने का अभ्यास डालो। एक घण्टा तो बैठना ही चाहिए, फिर धीरे-धीरे बैठने की आदत बन जाएगी।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-अपने घर चलने की तैयारी करो
अपने घर चलने की तैयारी करो जहाँ से आये हो। धन-सम्पत्ति, बच्चा-वच्चा सब स्वप्न है। जब चला गया तब सपना हो गया। दिन भी स्वप्न है और रात का भी स्वप्न है। पति-पत्नी का सम्बन्ध है कोई बीस साल तक, फिर सम्बन्ध छूट गया तो सब स्वप्नवत है। अपनी मंजिल तय करो। मंजिल का मतलब मुकाम। जिन मुकामों से आये हो उन मुकामों को तय करते हुए अपने निज देश सतलोक पहुँचे।
सत्संगियों को अपने मन की निरख-परख करते रहना चाहिए कि कितना असर सत्संग का मन पर हुआ, कितना भजन-ध्यान में रुका। इससे मन की चाल का पता लगता है।
शाकाहारी रहना। कोई भी ऐसा नशा मत करना कि बुद्धि पागल हो जाय। अधिक मिलना-जुलना कम करो। तुम जानते नहीं हो कि एक-दूसरे के कर्मों का बोझ कैसे ट्रांसफर होता है। मिलने-जुलने का बोझ आता है, इसे साधक जानते हैं। कभी किया, कभी भजन नहीं किया—यह आदत मत बनाओ। करोगे तो दया मिलेगा। अन्तर का दरवाजा खुलने तक काम हो जाएगा।
साठ साल के बाद भजन नहीं हो सकता। शरीर जर्जर होने लगता है। वैसे कोई-कोई जिसे लगन लगी रहती है वह कर सकता है, मगर कोई-कोई जिसे तड़प हो जाय।
जैसे ही तुम माला लेकर बैठते हो कि मन भाग जाता है तो फिर सुमिरन कौन करेगा?
आश्रम पर रहकर तुम पड़े सोये रहोगे तो तुम्हें यहाँ रहने का फायदा क्या? प्रातः घण्टी बजती है तो तुम्हें चाहिए कि मैदान में आकर भजन पर बैठ जाओ। वैसे प्रातः चार बजे सबको उठ जाना चाहिए।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-जिसको देखा नहीं उसकी पूजा कैसे करोगे?
जिसको देखा नहीं उसकी पूजा कैसे करोगे? ध्यान उसी का हो सकता है जिसे तुमने देखा है। इसीलिए कहा है कि “गुरु का ध्यान कर प्यारे।” गुरु इधर भी साथ देता है, ऊपर भी मददगार होता है। चेतन मुक्ति में गुरु के एक कदम भी नहीं चल सकते। इधर तो शरीर हाड़-मांस का है, किन्तु उधर ऊपर में सूक्ष्म और प्रकाशवान स्वरूप है। स्वच्छ देह होती है जो यहाँ है, इसमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है।जब हम सत्संग करते थे और कोई भाषण नहीं करता था तब लोग भजन अच्छा करते थे। सुमिरन भी करते थे और ध्यान भी करते थे। प्रेम था, भाव भी था, सेवा भी थी और दया भी थी, सब कुछ था। जब से मैंने भाषण शुरू किया तब से आज तक ये सब कुछ खत्म हो गया।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
7 नवम्बर 2000 से 13 नवम्बर 2000 तक
मैं बराबर कह रहा हूँ कि इस समय पर हिंसा बहुत हो रही है। सूअर को दौड़कर पकड़ते हैं और उसे उल्टा टाँग कर नीचे से आग लगा देते हैं। इतनी क्रूर हत्या! तुम ऐसी जगह पर खाओगे तो तुम्हें भी पाप लग जाएगा। नहीं मानोगे तो ऐसा समय आ रहा है कि तुम्हारे चिथड़े उड़ जाएँगे। इसलिए कहता हूँ कि शाकाहारी हो जाओ।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-जो नामदान लेने के बाद शाकाहारी नहीं रहते -कुदरत उन्हें सख्त सजा देती है।
अन्न का बड़ा असर होता है। कोई कुछ देता है, तुम बिना सोचे-समझे खा लेते हो, इसीलिए तुम्हारा भजन नहीं बनता है, विचार गन्दे हो जाते हैं और तुम गिर जाते हो।भव-सागर से पार जाने के लिए महापुरुष से प्रेम करना होगा। महापुरुष वही जो गुरु है, जिसकी तीसरी आँख खुली है और परमात्मा से मिलता हो। उनसे प्रेम कर लोगे तो तुम्हारा काम बन जाएगा। अगर नहीं करोगे तो परमार्थ का रास्ता साफ होगा।
सत्संग में पड़े रहे और आते-जाते रहो। सत्संग में पड़े रहोगे तो संसारियों से लाख दर्जा अच्छे हो। जैसे पहाड़ का पत्थर गर्म होता है और पानी का पत्थर ठण्डा रहता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
24 नवम्बर 2000 से 6 दिसम्बर 2000 तक
भजन करना है तो मोटी बातों को ध्यान में रखना होगा, नहीं करना है तो यह संसार है, फँसे रहो। तुम भजन करोगे और तुम बैठकर किसी का खाओगे तो तुम्हारे भजन में से चला जाएगा, तो तुम रखोगे क्या?दूसरे से सेवा तो मेवा है। तुम ये सोचो कि हम बहुत बड़े आदमी हैं, हम ऐसे हैं वैसे हैं, सेवा नहीं करेंगे तो यहीं रह जाओगे। सेवा करना है तो छोटा-बड़ा से क्या मतलब? महापुरुषों की बात किसी की समझ में जल्दी नहीं आती है।
हमारे स्वामी जी महाराज चार-चार घण्टे भजन में बैठे रहते थे, ये मैंने देखा है। एक बार मैंने साहस करके स्वामी जी महाराज से पूछा कि स्वामी जी! महापुरुष पूरे हो जाते हैं तो क्या तब भी भजन करते हैं? स्वामी जी बोले—“बेटा! भजन तो अन्तिम श्वांस तक करना है।”
हमने आप लोगों को टाट पहनाया कि सादगी में रहोगे तो मन फैलेगा नहीं। चटक-मटक में मन फँस जाता है। सत्संग में बात समझ में आती है। आप अपना चीज पकड़ो। इसमें क्या लोग बैठे हैं कि जा भजन करेंगे, उधर जाकर भूल जाएँगे। सेवा पवित्रता के लिए की जाती है। सेवा से मन, बुद्धि, चित्त, इन्द्रियाँ पवित्र होती हैं। तब भजन बनता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-कर्म और भजन
महात्माओं से प्रेम करो। प्रेम करने से तुम्हारी जीवात्मा को नाम से, शब्द से जोड़ देंगे, फिर काल तुम्हें कुछ बिगाड़ नहीं सकेगा। अन्यथा तुम्हें कर्मों का हिसाब देना पड़ेगा और उसमें तुम बच नहीं सकते।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-अन्तर की साधना और तड़प
दोनों आँखों के पीछे जीवात्मा का घाट है। वहाँ जब बैठने की आदत डालोगे तब तड़प बनेगी। तड़प और विरह जाग जाए तो कर्म जल्दी माफ होते हैं, फिर शब्द सुनाई देने लगता है और प्रकाश प्रकट हो जाता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-सेवा और सजगता
इस देश में आज सभी सेठ बन गए हैं, तभी तो सब काम खराब हो गया है। अब फिर से तुमको सीखना है। फिर से सीखोगे तो पुराने जमाने की बातें काम देंगी। सेवा चेतन्य और सचेत होकर करो। सब आरामतलब हो गए, तभी तो सब लोग रो रहे हैं। अभी तो ऐसा वक्त आने वाला है कि देश के हो या विदेश के, कोई कहीं भागेगा तो कोई कहीं भागेगा। वक्त को याद करो, ऐसी भगदड़ मचेगी।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-किसी का अपमान न करें
अकारण किसी को अपशब्द नहीं कहना चाहिए। किसी को अपमानित नहीं करना चाहिए। कोई तुम्हारे दरवाजे पर भीख माँगने आए, अगर नहीं देना है तो कह दो—चले जाओ—और वह चला जाएगा। अपशब्द मत कहो। मैंने इसलिए बताया कि बुरे काम का बुरा और अच्छे काम का अच्छा परिणाम होता है। कुदरत तुरन्त इंतजाम करती है और साधकों को तो बहुत सम्भलकर रहना चाहिए और बर्दाश्त करना चाहिए।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-गलत काम को तुरन्त छोड़ दो
अगर मनुष्य हो और मनुष्य की बुद्धि रखते हो तो गलत काम को तुरन्त छोड़ दो। जब तुम्हें पता चल जाए कि गलत काम है और उसके करने से तुम चौरासी और नरक में चले जाओगे तो फौरन छोड़ दो। आज और कल की क्या बात है, तुरन्त छोड़ देना चाहिए।
कुदरत के खिलाफ अगर तुम जाओगे तो वह तुम्हें माफ नहीं करेगी। इसलिए सम्भल जाओ, वरना उसके एक धक्के में सब साफ हो जाएगा।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-भजन से कर्मों का नाश
भजन तो तुमको करना ही पड़ेगा। बगैर भजन किए हुए कर्म नाश होंगे। भजन से कर्म जलाए जाते हैं। सभी महात्माओं ने भजन पर ही जोर दिया है। भजन करोगे तो बुरे कर्म नहीं बनेंगे।

समय कमजोर होता जा रहा है। तुम भजन करो, दूसरा कोई रास्ता नहीं।
सुमिरन, ध्यान और भजन तीनों जरूरी हैं। पहले यह काम। दो दिन किया और एक दिन नहीं किया तो यह ठीक नहीं। इससे साधना खण्डित हो जाती है। इसलिए भले ही थोड़ी देर के लिए करो, सुमिरन, ध्यान और भजन रोज करो।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-साधना में नियमितता
तुम कहते हो कि भजन नहीं बनता, आलस आती है। साधना-भजन करने का पक्का इरादा होना चाहिए। घर में रहकर सबकी सेवा करो, संयम से रहो और पति-पत्नी दो-तीन माह के लिए ब्रह्मचारी हो जाओ। घाट पर बराबर बैठोगे तो तड़प होगी, फिर भजन-ध्यान बनने लगेगा।
जब संकट का समय कभी आ जाए तब धैर्य के साथ उसे काट लेना चाहिए।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-निरंजन भगवान और मुक्ति
राम ने निरंजन भगवान की झलक देखी, जो सहसदल कमल में रहते हैं। गौतम बुद्ध ने भी यही अनुभव किया। केवल संत ही ऐसे हैं जो उनकी व्याख्या करते हैं और जीवात्माओं को उनके धाम में पहुँचाकर निरंजन भगवान का दर्शन-दीदार कराते हैं।
फिर उससे भी ऊपर ब्रह्म पद में और उससे भी ऊपर पारब्रह्म पद में पहुँचाकर मुक्ति और मोक्ष दिला देते हैं। मुक्ति और मोक्ष नीचे के किसी भी स्थान में नहीं हैं।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-दीनता और विनम्रता
दीन बन जाओ तो सभी लोग तुमको प्यार करने लगेंगे। जो दीन बन जाता है, परमात्मा उसी पर दया करता है। माताएँ अपने बच्चों को जंगल में छोड़ आती हैं तो कोई भी हो, जब उसे देख लेता है तो गोद में उठा लेता है, पालता-पोसता है।
जब तक मन में, बुद्धि में, चित्त में अहंकार रहेगा, सुरत (जीवात्मा) नाम को नहीं पकड़ सकती। जितने लोग तारीफ करें, उतने ही तुम छोटे बनते जाओ। दीन बनते चले जाओ। ऊपर जाने का रास्ता बहुत बारीक है, बगैर छोटा बने उसमें कोई घुस नहीं सकता।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-शाकाहार
दुख की तरफ सब लोग जा रहे हैं। गड्ढे में गिरने जा रहे हैं। सामान सब तैयार हो रहा है। मैं फिर कहता हूँ कि शाकाहारी हो जाओ। नहीं मानोगे तो तुम जानो और तुम्हारा काम जाने। कुदरत का करिश्मा कोई जानता नहीं।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-कर्मों का बोझ
सुरत (जीवात्मा) ब्रह्म पद से जब पार हो जाती है तब कारण शरीर छूट जाता है, अलग हो जाता है। ब्रह्मलोक के ऊपर पहुँचने पर ही जीवात्मा को अमृत पीने को मिलता है।शरीर से कमाई करके यहाँ का कर्म-बोझ उतार दो, लिंग शरीर से कमाई करके लिंग लोक का बोझ उतार दो, फिर सूक्ष्म और उसके बाद कारण बोझ उतार दो। फिर सारे बंधनों से सुरत अलग होकर स्वयं शब्द-रूप हो जाती है और तब उसे सच्ची मुक्ति और मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-क्रोध और झगड़े से बचें
लड़ाई-झगड़ा मत करो। कोई अगर गाली भी दे तो वहाँ से हट जाओ। दूर चले जाओ तो उसका जहर तुम पर नहीं चढ़ेगा। उसकी गाली उसी के पास वापस चली जाएगी। उसने तो आग लगा दी और तुम पागल हो गए। बर्दाश्त नहीं कर सकते हो तो वहाँ से चले जाओ।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-मौन और सहनशीलता
महात्मा चुप रहते हैं, हँसते रहते हैं, कुछ कहते नहीं। वे लोगों के कड़वे वचनों को बर्दाश्त करते-करते, सीखते-सीखते महात्मा बन जाते हैं, गुणी बन जाते हैं। चुप रहने में बहुत गुण होता है।
जो होना है वह तो होना ही है, तुम भजन करो। भजन करोगे तो आग लगने पर बचे रहोगे। दुनिया में जो हो रहा है उसे होने दो। कर्मों की आँधी चल रही है, उससे बचो।
इस दुनिया में इच्छा किसी चीज से पूरी नहीं होती—न धन से होती है और न ही सामानों से। यह देश ही कमी का है, इसमें पूर्णता आ ही नहीं सकती। सत्संग मिलने पर ही जीव जागता है।
मालिक से ऐसी दया माँगो कि तुम्हारा भजन बने। ऐसा नहीं कि दो दिन करो और फिर छोड़ दो। भजन रोज-रोज करो, फिर जलवा देखने को मिलेगा।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन=साधक का जीवन
कम खाओ, गम खाओ और कम सोओ। साधक जब इन बातों को अपने जीवन में उतार लेता है तब उसे सफलता मिलने लगती है।
अन्न को बर्बाद मत करो। अन्न देवता है। कई स्थानों पर सूखा पड़ा है, लोग दाने-दाने को तरस रहे हैं। भण्डारे में रोटी खाओ मगर बर्बाद मत करो। घर में रहो, वहाँ भी इस बात का ख्याल रखो।
जब शुरू-शुरू में सन्तों का आगमन हुआ तो उन पर लोगों को विश्वास नहीं होता था, पर सन्तों के आने का सिलसिला जारी हो गया। उन्होंने बड़ी मेहनत की जीवों के साथ, उन पर संस्कार डाले और संदेश सुनाया। अब संस्कारों का समूह बन गया है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-कर्म ही सामने आते हैं
कर्म ही काम है। जो तुमने कर्म किए हैं, वही तुम्हारे आगे आकर खड़े हो जाते हैं। इसीलिए तुमको दुःख-सुख भोगना पड़ता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-शब्द को पकड़ना है
शब्द को ही पकड़ना है। वही तो हाथ है, उँगली है। पकड़ लो तो चढ़ा दिए जाओगे, पर सब टूट गया, अविश्वास हो गया तो कैसे जाओगे?
तुम जल्दी मत करो। जितना वह कहें उतना करो, तो तुम्हें पहुँचा दिया जाएगा।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-सभी धर्मों का संदेश
जो ईसा मसीह ने कहा उसको करो तो तुम सच्चे ईसाई हो। जो मोहम्मद साहब ने कहा उसको करो तो तुम सच्चे मुसलमान हो। उन लोगों ने तो कहा कि जीवों पर रहम करो, मन-इन्द्रियों की कुर्बानी करो, रूह को पाक-पवित्र बनाकर खुदा की तरफ लगाओ। सोचो, तुम क्या करते हो।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-वचनों का पालन
तुमने प्रतिज्ञा की थी कि हमें बाहर निकालो, हम तुम्हारा भजन करेंगे; पर बाहर आते ही तुम भूल गए। यहाँ भी नामदान लेते हो तो कहते हो कि हम भजन करेंगे। करते नहीं हो तो चोट खाओगे?
अपना सुधार किया नहीं, भजन भी छोड़ दिया और दूसरों को सुधारने में लग गए। यह नहीं समझते कि अगर लोग भजन करने में लग जाएँगे तो सुधर जाएँगे।
वचनों का पालन करना चाहिए। वचनों का पालन हो तो ध्यान-भजन में सहायता होगी। वचनों का पालन करोगे तो गुरु का स्वरूप सामने आ जाएगा, नाम प्रकट हो जाएगा।

स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
14 जनवरी 2001 से 20 जनवरी 2001 तक
महापुरुषों के वचन सदा सत्य होते हैं। वे जमीन-आसमान में चले जाएँ या आसमान जमीन में आ जाए, लेकिन उनका शब्द बदलता नहीं। वे त्रिकालदर्शी होते हैं।
आँखों के नीचे पाँच स्थान हैं—एक गुदा, दूसरा इन्द्रिय द्वार, तीसरा नाभि कमल, चौथा हृदय चक्र, पाँचवाँ कंठ द्वार और छठे चक्र पर सुरत (जीवात्मा) खुद बैठी है, जिसको आज्ञा चक्र, तीसरा तिल, भृकुटी विलास कहते हैं। इसी छठे चक्र पर बैठकर सुरत नीचे सब चक्रों में अपनी ताकत देती है, तभी वे काम करते हैं।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-बुरी संगत से बचो
ध्यान-भजन से मन हट जाएगा तो बोझा लद जाएगा। इसीलिए बुरी संगत से बचो और जब कभी ऐसा मौका आ जाए तो ध्यान-भजन में ज्यादा समय दो। हर एक प्रेमी को वचन निभाना चाहिए। ऐसा अनुभव होता है कि संसारी झंझटों में हम आ जाते हैं तो मन मोटा हो जाता है।
सत्संगियों, तुम बचो। वचनों को हमेशा याद रखो। भजन में लगे रहो। सुमिरन-ध्यान में लगे रहोगे तो बुरी संगत का तुम पर जो असर होगा, वह छूट जाएगा।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-कर्मों का हिसाब
काल सबको पीट रहा है। तुम्हारे कर्मों का हिसाब ले रहा है। कर्म-कर्जा जो ले रहा है या जो दे रहा है, दोनों को यह पता नहीं कि किस जन्म के कर्जे का भुगतान हो रहा है। सब इसी कर्जे के लेन-देन में फँसे हुए हैं।
जब पूरे गुरु की कृपा हो, उनकी दया हो और वे नाम के साथ जोड़ दें, तभी तुम्हारी बचत है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-ध्यान और गुरु का अनुभव
जब ध्यान दोनों आँखों के पीछे तीसरे तिल में जाता है तो वहाँ गुरु बैठे हैं। उनसे प्रेम-भरी बातें होती हैं। तीसरे तिल में पहुँचने पर ध्यान में एकाग्रता हो जाती है और घंटे की धुन सुनाई देने लगती है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-भोजन और मनोभाव
खाना बनाने वाले के मनोभावों का असर भोजन करने वाले पर पड़ता है। क्रोध, ईर्ष्या अथवा वासनाओं का चिंतन करते हुए यदि कोई भोजन पकाता है तो वही भावनाएँ रोटी खाने वाले के मन पर प्रभाव डालेंगी।
पवित्र आचरण आध्यात्मिक महल की नींव है। जब तक इंसान मन और इन्द्रियों का गुलाम है, परमार्थ की उसकी बातों का असर दूसरों पर नहीं होगा। चुंबक चमकते हुए लोहे को आकर्षित करता है और अगर लोहे में जंग लगी है तो कोई असर नहीं होगा।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-तीर्थ-व्रत और सच्ची भावना
आप तीर्थ-व्रत करते हो, पर इसका फल नहीं मिला। क्यों? क्योंकि आपको अहंकार आ गया। अब आप अंधकार में घूम रहे हो।
सच्ची भावना से, सच्ची श्रद्धा से अगर तीर्थ-व्रत, पूजा-पाठ करो, तब उसका फल प्राप्त होता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-नामदान के बाद साधना
हम जैसे आपके पास जाते हैं, वैसे ही आपको हमारे पास आना-जाना पड़ेगा। यह नहीं कि नामदान ले लिया और घर बैठ गए! अपने विश्वास का रास्ता क्यों बंद करते हो? अपना ही नुकसान करते हो।
आपको रास्ता मिल गया, इसको छोड़ना नहीं। रोज सुबह-शाम, सोने से पहले और उठने के बाद सुमिरन, ध्यान और भजन करना है। यही साथ जाएगा।
भूल-चूक तो क्षमा हो सकती है, पर जब आपको यह मालूम हो जाए कि यह बुरा काम है तो उसे क्यों करते हो? अभी तक आपने भूल में किया, किसी ने आपको बताया नहीं; पर अब आपको बता दिया गया कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है। अब आप बुरा करोगे तो सख्त सजा मिलेगी।
अच्छा-बुरा दोनों समाप्त करो, रूह को पाक-साफ करो और उस पाक परवरदिगार में लगा दो।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
28 अप्रैल 2003 से 6 मई 2003 तक
मन को रोकने का आधार चाहिए। उसका आधार अन्दर है। दोनों आँखों के पीछे उसको रोको। हर प्रकार से मन को समझाने की जरूरत है। अगर इसकी समझ में आ गया और रुक गया तो काम बन जाएगा। मन टिक जाए तो सुरत आसानी से शब्द को पकड़ लेगी।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-गुरु की सीख और सच्चा शिष्य
जो गुरु की सीख मानेगा, तो वह सच्चा शिष्य बन जाएगा; पर गुरु की बात मानी नहीं और शिष्य बनाने लगे तो अपने ऊपर भार लाद रहे हैं। अपना कल्याण किया नहीं, दूसरों का कल्याण क्या करेंगे?
रामायण में लिखा है—
“हरै शिष्य धन शोक न हरई, सो गुरु घोर नरक में परई।”
जितने महात्मा प्रभु को पाने वाले आए, सबने एक बात कही कि जीते-जी भजन कर लो और प्रभु को पा लो।
उन्होंने हर तरह से मेहनत की, जीवों में संस्कार डाले, तभी तो लोगों में परिवर्तन हुआ। बातों को बना-बनाकर कहकर जीवों को ठगने से परिवर्तन नहीं होता।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-संतों की पहचान
जिन्होंने मालिक को प्राप्त कर लिया, उन्हें संत कहते हैं। संत मान-बड़ाई या कीर्ति के भूखे नहीं होते। उन्हें दुनिया में दिखावे की और नाम कमाने की जरूरत नहीं होती। उनमें अभिमान और घमंड लेशमात्र भी नहीं होता।
अन्ततः उस मालिक में और संतों में कोई अन्तर नहीं।
कबीरदास जी ने कहा है—
“सत्पुरुष की आरसी, संतों की है देह।
लखा जो चाहे अलख को, इनहीं में लखि लेह॥”
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन –तर्क से अधिक प्रेम
तर्क और प्यार के रूप अलग-अलग हैं। प्यार किसी कानून को नहीं जानता। कानून और तर्क इस दुनिया के कारोबार के लिए बने हैं, लेकिन परमात्मा और परमात्मा के धाम तक सिर्फ प्यार के पंख के सहारे उड़कर ही पहुँचा जा सकता है।
गुरुवाणी में आता है—
“सांच कहें सुन लियों सवै, जिन प्रेम कियो तिनहीं प्रभु पायो।”
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-मृत्यु और कर्म
मौत और आत्महत्या जिंदगी की मुसीबतों का इलाज नहीं हैं और न ही उनसे छुटकारा मिल सकता है। जीवात्मा मरने के बाद जहाँ भी जाएगी, मुसीबतें पीछे-पीछे जाएँगी। जब तक कर्मों के कर्जे की एक-एक पाई न चुका दी जाए, तब तक कर्म पीछा नहीं छोड़ेंगे।
कर्मों का बोझ आत्मा पर पहले से ही लदा हुआ है। आत्महत्या के बाद और भारी बोझ लद जाता है। कर्मों से छुटकारा पाना आसान नहीं है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
7 मई 2003 से 13 मई 2003 तक
मौका सबको दिया जा रहा है—स्त्री, पुरुष और बच्चों को। आप इच्छा चलने की बनाओगे तो रास्ता कठिन नहीं है। सीधा, सरल और आसान है। इच्छा नहीं है, इसलिए रास्ता कठिन है। इसीलिए भजन नहीं होता।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-शब्द सुनाई दे तो सजग रहें
मेरे पास एक फोन आया कि मुझे शब्द सुनाई देता है, पर वह पकड़ में नहीं आता। मैंने कहा कि तुम्हारा मन भाग जाता होगा। वह बोला कि मन नहीं भागता।
मैंने उसको समझाया कि फिर तुम तन्द्रा अवस्था में आ जाते होगे। तन्द्रा कहते हैं—न सोने में, न जागने में।
इसलिए मैं बराबर कहता हूँ कि जब शब्द सुनाई दे तो होशियारी से, चेतन होकर सुनो और उसमें लय होने की कोशिश करो।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-नाम और शब्द
“नाम”, “शब्द”, आकाशवाणी अथवा ईश्वरी संगीत—ये सर्वव्यापक हैं। यह सृष्टि के कण-कण में रचा हुआ है। यह हर मनुष्य की आँखों के बीच में एक मनोहर संगीत और अलौकिक ज्योति के रूप में मौजूद है।
“नाम” में ध्वनि और प्रकाश एक साथ मौजूद हैं। सबके अन्दर वह दिव्य प्रकाश है जिसमें दिव्य धुन है। आत्मा जब इस धुन को सुनती है, तब सच्चा प्यार प्रभु के साथ जागृत होता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
14 जून 2003 से 20 जून 2003 तक
जो दया करते हैं वही यहाँ से निकल सकते हैं, जो कठोरता रखते हैं वे नहीं जा सकते। कोई भूखा आ जाए तो उसे रोटी दे दो। अगर वह संकोचवश नहीं कह सकता तो आप उससे पूछो। तुम्हारे पास दया का स्रोत सूखने न पाए। ये साधना में उन्नति करने वाली चीजें हैं।
महात्माओं के पास आप क्यों जाते हो? क्योंकि आप जानते हो कि उनके मन में आपके लिए कोई विकार नहीं है, कोई कठोरता नहीं है। वे जो कहते हैं वह सच है, इसीलिए तो जाते हो। जाते रहोगे तो धीरे-धीरे बदल जाओगे।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-तकलीफें चारों तरफ से तुम्हारे कर्मानुसार मंडरा रही हैं।
महात्माओं की दया हो रही है और तुम बच रहे हो। अगर उनकी दया न होती तो तुम्हारे कर्मों की ऐसी बरसात होती कि तुम समझ भी नहीं पाते।
तुम दरवाजे पर रोज बैठो, दया जरूर आएगी। प्रीत और प्रतीति से परमार्थ का धन प्राप्त होता है। जल्दीबाजी मत करो। धीरज रखो। जल्दी का काम शैतान का और धीरज का काम रहमान का।
गुरु महाराज जो करेंगे, वह सब ठीक और तुम्हारे हित का होगा। मन नहीं रुकता तो बैठे रहो, धीरे-धीरे वह रुकने लगेगा।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
21 जून 2003 से 27 जून 2003 तक
जब मनुष्य के स्वांसों की पूंजी समाप्त होती है और अन्तिम समय आता है, तब काल भगवान अपने सिपाहियों यानी जमदूतों से कहते हैं—अमुक व्यक्ति का समय पूरा हो गया, उसे ले जाओ।
यमदूत जोर की आवाज लगाते हैं कि तैयार हो जाओ, तुम्हारा समय पूरा हो गया। उनकी आवाज सुनते ही मनुष्य भयभीत हो जाता है। आँखें अंधी, कान बहरे, जुबान बन्द और शरीर शिथिल हो जाता है। यमदूत जीवात्मा को शरीर से बाहर निकाल देते हैं। शरीर जमीन पर गिर जाता है और चेतन आत्मा के निकल जाने पर शरीर मिट्टी के समान हो जाता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-घंटे और शंख की मधुर आवाज तीनों लोकों में बज रही है।

जब जीवात्मा दोनों आँखों के पीछे के घाट पर पहुँचती है और आकाशवाणी सुनती है, तब अन्तर में प्रकाश प्रकट होता है। धीरे-धीरे प्रकाश बढ़ता जाएगा और उसका आधार मिल जाएगा। देवी-देवता दिखाई देने लगेंगे, स्वर्ग, वैकुण्ठ आदि लोकों की रचनाएँ नजर आने लगेंगी।
घंटे और शंख की मधुर आवाज तीनों लोकों में बज रही है। जब जीवात्मा उसमें लय हो जाएगी तब उसे अमृत पीने को मिलेगा।
सहसदल कमल ईश्वर का स्थान है, जहाँ ज्योति स्वरूप निरंजन भगवान बैठे हैं। उसके आगे ब्रह्म का स्थान है, जहाँ अनहद वाणियाँ होती रहती हैं। वहाँ ब्रह्मा का दर्शन होता है और आगे गुरु विराजमान हैं।
परमार्थ का धन सोना, चाँदी और पैसों से नहीं मिलता। जनता का लूटा हुआ धन चला जाता है और लोग देखते रह जाते हैं। मेहनत और मशक्कत की कमाई फलती-फूलती है। दिल में दया भाव रहेगा तो परमार्थ का रास्ता सुलभ हो जाएगा और चलते-फिरते कोई न कोई महापुरुष मिल जाएगा।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
28 जून 2003 से 6 जुलाई 2003 तक
जीवात्मा चेतन है और शरीर जड़ है। शरीर जीवात्मा की चेतन्यता से चेतन हो रहा है। आँखें देख रही हैं, कान सुन रहे हैं और शरीर के सभी अंग अपना-अपना काम कर रहे हैं। मन, बुद्धि, चित्त और अन्तःकरण भी जीवात्मा की चेतन्यता से कार्य करते हैं।
तुम भजन करो और अपने पर विश्वास करो। उस मालिक का शुक्राना करो कि मालिक ने जितना दिया, बहुत अच्छा किया। मेहनत चाहे जितनी करो, मिलेगा उतना ही जितना तुम्हारे प्रारब्ध में है—न एक कम, न एक ज्यादा। हाँ, भजन में लग जाओगे तो मालिक की दया उतरेगी।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-सत्संगी वह है जो सत्संग का काम करेगा
सत्संगी वह है जो सत्संग का काम करेगा और सत्संगी की रहनी के मुताबिक रहेगा। केवल नामदान लेने से सत्संगी नहीं हो जाता। नामदान जो बताया जाता है, उसका काम करने से सत्संगी होता है।
ध्यान और भजन के वक्त सुरत ऊपर के लोकों में जाती है। जब ध्यान बनता है तो ऊपर को चलती है। अन्तर में विकार नहीं होना चाहिए। शब्द चेतन है और वह हर भाव को समझता है। विकार रहेगा तो साधक नीचे गिर जाएगा।
सुमिरन, ध्यान और भजन के लिए विकार नहीं रहे, चाह न रहे, वासना न रहे और तरंग न रहे। तरंग रहेगी तो साधक उन तरंगों में उड़ जाएगा और अपना लक्ष्य छूट जाएगा।
मृत्यु लोक से दोनों आँखों के बीच से रास्ता ऊपर के लोकों में गया है। आगे फरिश्ते यानी जमदूत जीवात्मा को ले जाकर धर्मराय के यहाँ पेश करते हैं, जहाँ जीवनकाल में किए गए कर्मों का इन्साफ होता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
7 जुलाई 2003 से 13 जुलाई 2003 तक
टाट वाले जितने भी हैं, अच्छी तरह समझ लें कि आप लोग किसी को धोखा नहीं देंगे। अगर आपको धोखा देना है तो टाट उतार दो, पहनना बन्द कर दो; उसकी जरूरत नहीं।
परिवर्तन तो होना ही है। जो बात सत्य है, वह सत्य ही रहेगी। आगे फरिश्ते जीवात्मा को लेकर धर्मराय के यहाँ जाएँगे। वहाँ कर्मों का हिसाब होगा। जैसा किया है, वैसा ही भुगतान करना होगा।
महापुरुष जो आते हैं, वे क्षमा कर देते हैं। लेकिन क्षमा केवल महापुरुष की ओर से होती है। कर्मों का फल तो भुगतना ही पड़ता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-अन्तर में गंगा, जमुना और सरस्वती हैं।
अन्तर में गंगा, जमुना और सरस्वती हैं। वहाँ एक जगह से सूरज निकलता है। संसार की तुलना में उन नदियों का पाट बहुत विशाल है। उनके जल में जीवात्माएँ स्नान करती हैं।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
21 जुलाई 2003 से 27 जुलाई 2003 तक
जीवात्मा का हृदय दोनों आँखों के पीछे है। अगर गुरु के स्वरूप को हृदय में बसा लिया जाए तो संसार छूटने लगता है। तड़प और बेचैनी इतनी तीव्र होती है कि मालिक उसे बर्दाश्त नहीं करता और घट का पट खोलकर अपने प्रकाशमय रूप का दर्शन देता है।
शराब आदि का नशा अनेक विकारों और पापों का जन्मदाता माना गया है। शराब के प्रभाव में जीव को अपने-पराये और भले-बुरे की पहचान नहीं रहती। वह ऐसे गलत काम कर बैठता है जिससे उसके कर्मों का बोझ बहुत बढ़ जाता है और जिसका फल उसे जन्म-जन्मांतरों तक भुगतना पड़ता है।
एक प्रेम चलताऊ होता है। नामदान ले लिया और गुरु को मालूम ही नहीं कि चेला क्या कर रहा है और न चेले को गुरु के बारे में पता है—बस गुरु बना लिया। यहाँ यह चीज नहीं है। यहाँ तो जो बताया गया है, वह करना है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-जब कुछ कमाई करोगे तभी अन्तर में रास्ता मिलेगा
जब कुछ कमाई करोगे तभी अन्तर में रास्ता मिलेगा और अनहद धुन सुनाई देगी। नाम लेकर घर बैठ जाने से कुछ होने वाला नहीं। कमाई करनी होगी और आते-जाते रहो।
मनुष्य जीवन की विज्ञान की प्रयोगशाला तीसरे तिल में है। जहाँ प्रवेश होने पर आध्यात्मवाद का रहस्य समझ में आना शुरू होता है। तीसरा तिल दोनों आँखों के ऊपर है। शुरू-शुरू में अपने बिखरे हुए ध्यान को इकट्ठा करके यहाँ लगाना पड़ता है।
अमीरी और गरीबी का सम्बन्ध मन की इच्छाओं और तृष्णाओं के साथ है। जिसको कोई चाह नहीं है वही सबसे अधिक धनवान है और जिसको किसी वस्तु की कामना नहीं है वही शाहंशाह है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
28 जुलाई 2003 से 6 अगस्त 2003 तक
तुम भजन करते हो, सुमिरन-ध्यान करते हो तो जो गुरु मिलता है वह आत्म-धन है। आत्म-धन को दबाकर, छिपाकर रखो और यह कहो कि हमको कुछ नहीं चाहिए, तब तुम्हारा धन बचा रहेगा।
अगर तुम्हारी इच्छा बाहर लगी रही और तुम सोचो कि जो कमाई की उससे दुनिया के सामान मिल जाएँ तो वह तो मिल जाएगा, लेकिन तुम्हारा आत्म-धन खर्च हो जाएगा। इसलिए बड़ी सावधानी से रहो।
सत्संग की बड़ी जरूरत है। एक दर्शन यह है कि जो सामने बैठे हैं और एक दर्शन अदृश्य का है, जो सुरत करती है। वह बहुत विशाल है।
पहाड़ों में आप जाइए तो वहाँ लोगों में धार्मिकता दिखाई देती है। पहले के समय में लोग सीधे-सादे और ईमानदार रहते थे। कोई लूटपाट, चोरी-चकारी नहीं होती थी।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-ज्ञान का भंडार मनुष्य के अन्दर है
ज्ञान का भंडार मनुष्य के अन्दर है और वह भंडार अनहद-धुन का है। नाम और शब्द से सभी ज्ञान निकलते हैं। साधक नाम की डोर पकड़कर जितना ही ऊपर जाएगा, उतना ही अधिक दिव्य लोकों का सफर करेगा।
जब आत्मा सत्पुरुष से मिलाप कर लेती है तब उसे अपने घर का दरवाजा प्राप्त हो जाता है। इसके पड़ते जो कुछ भी होता है, वह प्रकाशित होने लगता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
7 अगस्त 2003 से 13 अगस्त 2003 तक
हमेशा सच्चाई, मेहनत और ईमानदारी की कमाई से रोटी खाओ। मेहनत और ईमानदारी से रहोगे तो मालिक की बरकत तुममें जुड़ जाती है। बरकत का मतलब है आशीर्वाद और दया। दया जुड़ जाने से कभी कमी नहीं पड़ती।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-वक्त कम रह गया है। जल्दी अपना काम कर लो।
तुम्हारा ख्याल कौन रखेगा? मालिक रखेगा। तुम कभी इधर भटकते हो, कभी उधर भटकते हो, इसलिए मन स्थिर नहीं रहता।
वक्त कम रह गया है। जल्दी अपना काम कर लो।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
14 अगस्त 2003 से 20 अगस्त 2003 तक
परमार्थ पढ़े-लिखे के ज्ञान की चीज नहीं है। यह भाव, भक्ति, श्रद्धा और प्रेम का ज्ञान है। पढ़े-लिखे हो, गीता पढ़ लो, रामायण पढ़ लो या कोई और ग्रंथ पढ़ लो—उससे अपने आप भक्ति नहीं आएगी।
जो साधना करने वाले होते हैं, वे अपनी साधना को इतना छिपाकर रखते हैं कि कोई उन्हें समझ नहीं पाता। साधना दिखावे की वस्तु नहीं है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-शाकाहारी रहना बहुत आवश्यक है।
अपने प्रारब्ध पर और उस मालिक पर थोड़ा विश्वास रखने की जरूरत है। मनुष्य को पशु-पक्षियों से भी कोई न कोई सीख मिलती है।
एक बात याद रखो—तुम जिसका लोगे, उसको देना पड़ेगा, क्योंकि यह कर्म-कर्जा है। अगर बचना चाहते हो तो भजन करो। कहीं भी रहो, एकान्त बना लो और भजन पर बैठ जाओ।
शाकाहारी रहना बहुत आवश्यक है। खान-पान बिगाड़ने से जीवन और साधना दोनों पर प्रभाव पड़ता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
21 अगस्त 2003 से 27 अगस्त 2003 तक
वचन के साथ दया-दृष्टि काम करती है। बल मिलता है। मन की कमजोरी को पकड़ना चाहिए। सत्संग में उसका निराकरण होता है।
जो सामने कहता है कि भजन करेंगे, लेकिन घर जाकर सुस्त हो जाता है, इसलिए इसकी बराबर चौकसी करनी चाहिए।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-जमीन का भी असर होता है।
जमीन का भी असर होता है। कुछ जमीन इतनी रूखी होती है कि वहाँ पैदा होने वाले लोगों के स्वभाव पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। जहाँ राक्षसी प्रवृत्ति के लोग रहते हैं, वहाँ की जमीन भी धीरे-धीरे बदलती है।
तुम कहते हो कि भगवान सब करता है और कराता है। यह तुम्हारी भूल है। उसने तुम्हें पूरा-पूरा अधिकार दिया है कर्म करने का। तुम्हारा सारा हिसाब लिखा जाता है और कर्मफल मिलता है। तुम कर्म करने में स्वतंत्र हो, लेकिन फल भोगने में परतंत्र हो।
महात्मा ऐसी शक्तियों से कोई मतलब नहीं रखते। आत्मा की शक्ति से अधिक बलवान कोई दूसरी शक्ति नहीं है।
गुरु समर्थ हैं। उनके लिए किसी भी जीवात्मा को ऊपर के मण्डलों, स्वर्ग और वैकुण्ठ आदि में ले जाना मुश्किल नहीं है, लेकिन वे ऐसा साधारणतया नहीं करते क्योंकि भजन के बिना आत्मा को ऊपर पहुँचाने से उसे तकलीफ होती है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
7 दिसम्बर 2003 से 13 दिसम्बर 2003 तक
आत्मा इस तन-मन के पिंजरे में कैद है। संतमत में साधना के द्वारा जीते-जी आत्मा को इस शरीर से अलग करके उसके मूल स्रोत परमात्मा से मिलाया जाता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-जो ताकत जीव को मुक्ति और मोक्ष देती है उसको “नाम” कहते हैं।
जो ताकत जीव को मुक्ति और मोक्ष देती है उसको “नाम” कहते हैं। नाम हर इंसान के अन्दर है। नाम आवाज है, संगीत है, वाणी है तथा स्वयं परमात्मा है। उस नाम की महिमा नहीं की जा सकती।
रामायण में कहा गया है—
“कहाँ कहूँ लगि नाम बड़ाई, राम न सकहिं नाम गुण गाई।”
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
7 जनवरी 2004 से 13 जनवरी 2004 तक
यह तो उसका कारखाना है। वक्त को जो काट देता है, वह समझो घर पहुँचता है। वक्त को प्रेम से काटना चाहिए। सब पर समय की मार पड़ती है। कोई छोटा-बड़ा काम कर लो, बुरा समय थोड़ा ही रहेगा। खराब समय निकल जाएगा और फिर सब अपनी जगह पर आ जाएगा।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-वक्त को प्रेम से काटना चाहिए।
विश्वास रखोगे तो समय कट जाएगा। घबराना नहीं चाहिए।
एक जगह बैठकर रोटी की इन्तजारी मत करना। हराम की कमाई मत खाना। मेहनत करके खाना और इतने ही शब्द सुन लो—भजन कर लो। भजन करोगे उसी में सच्ची दक्षिणा मिलेगी।
जो तुम्हारे प्रारब्ध में है, वह आज का आज देगा, कल का कल देगा। तुम उसके बीच में बाधा मत बनो, उसका विश्वास करो।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
28 जनवरी 2004
हमारे स्वामी जी महाराज ने कहा था कि एक जगह बैठकर रोटी की इन्तजारी मत करना, हराम की कमाई मत खाना। मेहनत करके खाना और भजन करना।
बहुत लोगों तक हमारी बात पहुँच गई है। बहुत से लोग शाकाहारी हो गए हैं और शराब छोड़ चुके हैं।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
21 फरवरी 2004 से 27 फरवरी 2004 तक
यह बात सच है कि जब परमात्मा की याद से लोग दूर हो जाते हैं तब प्रकृति-माया की तरफ से कुदरती मुसीबतों का कोट खींचा जाता है। जब लोग मुसीबत में आ जाते हैं तो उन्हें अशान्ति मिलती है।
कलयुग आने पर लोगों का शारीरिक बल कम हो गया, आत्मबल कम हो गया और मानसिक बल भी कम हो गया। लोग बाहरी भौतिक भोगों में लग गए हैं। वहाँ सच्चा आनन्द, सुख और शान्ति नहीं मिल सकती।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
फरवरी 2004 से 6 मार्च 2004 तक
संतमत में सर्वोपरि प्रेम की महिमा है। यदि प्रेम बन गया तो सब कुछ हो गया और यदि गुरु से प्रेम नहीं हुआ तो अभ्यास भी नहीं बन सकेगा।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-गुरु सदा प्रेम पर जोर देते हैं।
गुरु सदा प्रेम पर जोर देते हैं। मछली का प्रेम जल से, पतंगे का प्रेम दीपक से, चकोर का प्रेम चाँद से और इसी प्रकार सच्चे सेवक का प्रेम गुरु से होना चाहिए।
बच्चो! हम तुमको प्यार करते हैं, इतना प्यार माता-पिता से भी अधिक। प्यार कोई जबरदस्ती नहीं है। प्यार ऊपर वाला देता है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
28 मार्च 2004 से 6 अप्रैल 2004 तक
जो पूरे पहुँच जाते हैं, वे भी तब तक कुछ नहीं कहते जब तक उनके गुरु का आदेश न हो जाए। तुम भी गुरु की तरफ देखो। इधर-उधर देखने लगते हो, इसी से डाँवाडोल रहते हो।
यहाँ बहुत अच्छे साधना करने वाले लोग हैं, लेकिन वे सीधे-सादे और अपने को छिपाकर रखते हैं। तुम उन्हें पहचान नहीं सकते। यह अन्तर का भेद है, मालिक का पर्दा है। इसे छिपाकर रखना चाहिए।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-असली काम अपना है—भजन
उतना ही काम करो जिससे शरीर और बच्चों का भरण-पोषण होता रहे। बाकी असली काम अपना है—भजन। तुम दुनिया के कामों को आगे करोगे और भजन को पीछे रखोगे तो धोखा खाओगे।
प्रकाश तथा शब्द यानी नाम दोनों तीसरे तिल में मौजूद रहते हैं। वे कभी उस केन्द्र से गायब नहीं होते। प्रकाश और शब्द को पकड़ने के लिए साधक को तीसरे तिल में पहुँचना जरूरी है।
“नाम” का खजाना सत्संगियों से कोई नहीं छीन सकता और न यह कहीं खो सकता है। यह खजाना उसके अन्दर रखा हुआ है।
7 अप्रैल 2004 से 13 अप्रैल 2004 तक
तुम्हें तो यह पता नहीं कि तुमने क्या अच्छा किया है। इसलिए जो गुरु कहें उसको करो। उनका शुक्राना करो और हमेशा यह सोचो कि जो कुछ गुरु करेंगे, हमारे हित में करेंगे।
आप यह सोचो कि हमें कहाँ रहना चाहिए। इस संसार में जहाँ आज बनेगा और कल बिगड़ जाएगा, यहाँ सब कुछ चलायमान है। अपने रास्ते पर चलते चलो, चलते चलो जब तक अपने घर न पहुँच जाओ।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-मौका सबको दिया जा रहा है
जब आपको अन्तर का भेद और उसका पता-निशान मिल जाए तो आप बराबर उसको याद करते रहो। जब तुम याद करोगे तो मालिक की दया होगी। मालिक की दया होगी तो सुमिरन, ध्यान और भजन बनेगा।
मौका सबको दिया जा रहा है—स्त्री हो, पुरुष हो, बच्चे हों, बूढ़े हों, छोटे-बड़े हों, अमीर-गरीब हों, पढ़े हों या अनपढ़ हों। सभी को अपने घर चलने की इच्छा बनानी चाहिए।
14 अप्रैल 2004 से 20 अप्रैल 2004 तक
भजन में लगो तो धीरे-धीरे तुम्हारी आदत पड़ जाएगी। जब कुछ मिलने लगेगा तो पुरानी आदत छूटेगी। लोग पुरानी आदतों में उलझे रहते हैं और भजन से दूर रहते हैं।
आप कहते हो कि हम महात्माओं और संतों को पहचान लेंगे। बड़े-बड़े योगी और तपस्वी आए, वे भी उन्हें नहीं पहचान पाए तो आप कैसे पहचानोगे? उनका रास्ता अन्दर और ऊपर जाने का है। कोई बाहरी क्रिया नहीं है।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-सुरत-शब्द मार्ग कोई नया रास्ता नहीं है
सुरत-शब्द मार्ग कोई नया रास्ता नहीं है। यह अभ्यास की वह विधि है जो सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग में परम्परा से चली आई है। इसे कोई बदल नहीं सकता।
कबीर साहब, गुरु नानक देव जी, पलटू साहब, दादू, मौलाना रूमी और शम्स तवरेज आदि महात्माओं ने इसी मार्ग का भेद प्रकट किया।
इस मार्ग का किसी सम्प्रदाय, धर्म, जाति या देश से सम्बन्ध नहीं है। हर स्त्री-पुरुष इस नियामत का हकदार है। कुल मालिक एक है और उससे मिलने का तरीका भी एक ही है।
इसी प्रकार संतमत और आध्यात्मिक विषयों से संबंधित स्वामी गरीब दास जी महाराज के प्रश्न-उत्तर पढ़ने के लिए हमारा अगला संग्रह देखें।
👉 स्वामी गरीब दास जी महाराज — संत सत्य वचन
28 जून 2004 से 6 जुलाई 2004 तक
अगर सच्चे मालिक को प्राप्त करना है और जीवात्मा को नरकों तथा चौरासी लाख योनियों में जाने से बचाना है तो उस सौदागर को प्राप्त करो जो उस मालिक के पास जाता-आता है।
कीमत क्या है? प्रेम और प्रतीति। उसे प्रेम से प्राप्त करो। वह पक्का सौदागर है। उसके पास हर किस्म का माल है। प्रेम के वश में आकर वह सब कुछ दे देगा। उसे तो प्रेम चाहिए।
साधन इसलिए कराया जाता है कि मन, बुद्धि और चित्त निर्मल हो जाएँ और सुरत की आँख खुल जाए।
स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन-वह मालिक अन्धा और बहरा नहीं है। –
वह मालिक अन्धा और बहरा नहीं है। वह सब कुछ देखता और समझता है। करनी करो, कमाई करो तो जन्म-मरण का बन्धन समाप्त हो जाएगा। करनी नहीं करोगे तो कर्मानुसार फल मिलेगा।
जितना प्रारब्ध का है, वह तुम्हें रोज मिलता रहेगा। वह तो एक बहाना है। भजन करोगे तभी छुटकारा होगा।
जब तन, मन और धन गुरु पर चढ़ा दोगे तभी काम बनेगा। मन को घाट पर लाना है। दुनिया का चिन्तन अधिक करते हो इसलिए मन रुकता नहीं।
मुक्ति का समय मनुष्य जन्म ही है। जिसे मनुष्य जन्म में गुरु नहीं मिला, शब्द या नाम नहीं मिला, उसने अपना जन्म खो दिया। मनुष्य जन्म प्राप्त करके यदि घट का पट नहीं खोला तो जन्म नष्ट हो गया।
महत्वपूर्ण सूचना
यहाँ “स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन” पुस्तक से कुछ चुनिंदा अनमोल वचन प्रस्तुत किए गए हैं। पुस्तक में बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के अनेक महत्वपूर्ण वचन संकलित हैं। अधिक जानकारी और सम्पूर्ण सामग्री के लिए पुस्तक “स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन” का अध्ययन करें।
पुस्तक परिचय
पुस्तक: स्वामी जी के अनमोल सत्य वचन
प्रवक्ता: बाबा जयगुरुदेव जी महाराज
प्रकाशक:Anter-Dhwani Sansthan Mathura 281004
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