बिन-विश्वास-न-कौनों-सिद्धि

अनुभव-कथा/श्रद्धालु का व्यक्तिगत अनुभव

एक श्रद्धालु का अनुभव — संकट की घड़ी में “जयगुरुदेव” नाम का स्मरण

परम पूज्य बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के प्रति श्रद्धालुओं के मन में श्रद्धा और विश्वास के अनेक अनुभव सुनने को मिलते हैं। ऐसा ही एक व्यक्तिगत अनुभव राजकुमार गुप्ता, कुशीनगर ने साझा किया है।

राजकुमार गुप्ता बताते हैं कि मई 2026 के अंतिम सप्ताह में वे एक पिकअप वाहन से सरसों की खली लोड करके गोररिया गाँव, कुबेरापट्टी के निकट जा रहे थे। पिकअप में लगभग 25 क्विंटल सरसों की खली लदी हुई थी।

रास्ता बहुत सकरा और कीचड़ से भरा हुआ था। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, उन्हें ऐसा लग रहा था कि कहीं गाड़ी खेत में न उतर जाए। इसके बावजूद वे मन ही मन “जयगुरुदेव” का स्मरण करते हुए आगे बढ़ते रहे।

काफी मिट्टी और कीचड़ से भरे रास्ते को पार करने के बाद अंतिम हिस्से में बहुत अधिक फिसलन थी। उस समय उन्हें आगे का रास्ता कठिन दिखाई दे रहा था। उन्होंने बताया कि उस समय वे केवल “जयगुरुदेव, जयगुरुदेव, जयगुरुदेव…” का जाप करने लगे।

अंतिम छोर तक पहुँचने से पहले ही पिकअप का पिछला पहिया मेड़ से नीचे उतर गया और गाड़ी के पलटने जैसी स्थिति बन गई। परिस्थिति देखकर वे बहुत चिंतित हो गए। उसी समय उन्हें गुरु महाराज का स्मरणहुआ और उन्होंने लगातार “जयगुरुदेव” नाम का जाप किया।

उनके अनुसार, कुछ प्रयास के बाद ट्रैक्टर की सहायता से पिकअप को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। इस घटना को वे बाबा जयगुरुदेव जी की दया और कृपा के रूप में अनुभव करते हैं।

राजकुमार गुप्ता कहते हैं कि उस समय की परिस्थिति कितनी भयावह थी, इसे वही व्यक्ति समझ सकता है जिसने स्वयं उस स्थिति को देखा और महसूस किया हो। उनके अनुसार, उस कठिन घड़ी में बाबा जी का स्मरण उनके लिए विश्वास और सहारा बना।

वे अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं कि “जयगुरुदेव” नाम का स्मरण कठिन परिस्थितियों में मन को शांति और सहारा देता है। उनका विश्वास है कि जब मनुष्य संकट के समय श्रद्धा और विश्वास के साथ नाम का स्मरण करता है, तो उसके भीतर कठिन परिस्थिति का सामना करने का साहस उत्पन्न होता है।

“बिन विश्वास न कौनों सिद्धि।”

यह राजकुमार गुप्ता का व्यक्तिगत अनुभव और उनकी श्रद्धा है, जिसे उन्होंने बाबा जयगुरुदेव जी के चरणों में अपनी भावनाओं के रूप में प्रस्तुत किया है।

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