मनुष्य का जीवन केवल संसार के कामों में लगे रहने के लिए नहीं है। स्वामी जी कहते हैं कि मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने और उस परम सत्य की ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। संसार में रहते हुए भी जीव अपने भीतर की ओर ध्यान दे सकता है और अपने जीवन को आध्यात्मिक साधना से सार्थक बना सकता है।
श्री स्वामी गरीब साहब जी महाराज के संत सत्य वचन में साधक को बार-बार सत्संग, सतगुरु की शरण, नाम-सुमिरन, भजन और सुरत को भीतर की ओर लगाने की प्रेरणा मिलती है। वे बाहरी दिखावे की अपेक्षा उस अंतर यात्रा को महत्व देते हैं, जिसमें जीव धीरे-धीरे अपने भीतर के मार्ग को पहचानता है।
श्री स्वामी गरीब साहब जी महाराज का जीवन परिचय
स्वामी जी का जीवन प्रारंभ से ही आध्यात्मिक खोज की ओर मुड़ा हुआ दिखाई देता है। उपलब्ध जीवन चरित्र के अनुसार, श्री स्वामी गरीब साहब जी महाराज का जन्म पटियाला में संवत् 1900 की वैशाख सुदी 3 को कपूर खत्री परिवार में हुआ था और उनका जन्म नाम नारायण दास बताया गया है। नौ वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़कर सिद्ध श्री योगेश्वर ज्ञानी जी की शरण ली। इसके बाद उन्होंने कश्मीर के मारकंड पहाड़ की गुफा में सात वर्ष तक अंतर-अभ्यास किया। आगे चलकर संवत् 1930 में वे परम संत स्वामी शिवदयाल जी के पास आगरा पहुँचे।
स्वामी जी ने बाद में हाथरस और दिल्ली की ओर सत्संग करते हुए जीवों को आध्यात्मिक मार्ग की ओर लगाया। जीवन चरित्र में उनके द्वारा लगभग पाँच हजार जीवों के उद्धार का उल्लेख मिलता है।
उनका जीवन साधना, सत्संग और जीवों को आध्यात्मिक मार्ग समझाने में लगा रहा।

संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-सत्संग को जीवन में स्थान दो
स्वामी जी कहते हैं कि मनुष्य का मन संसार की ओर बहुत जल्दी आकर्षित हो जाता है। इच्छाएँ बढ़ती रहती हैं और मन एक विषय से दूसरे विषय की ओर भागता रहता है।
इसीलिए साधक को अच्छी संगति की आवश्यकता है।
आप कहते हैं कि सत्संग केवल बैठकर बातें सुनने का नाम नहीं है। सत्संग का वास्तविक लाभ तभी है जब उसके वचनों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया जाए।
मनुष्य जिस प्रकार की संगति करता है, उसका प्रभाव उसके विचारों और जीवन पर पड़ता है। इसलिए स्वामी जी साधक को संतों और अच्छे साधकों की संगति में रहने की प्रेरणा देते हैं।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-सतगुरु की महिमा को भीतर से समझो
स्वामी जी के वचनों में सतगुरु की महिमा केवल बाहरी रूप में नहीं है। आप कहते हैं कि सतगुरु का वास्तविक संबंध जीव की अंतर यात्रा से है।
सतगुरु जीव को भीतर के मार्ग की जानकारी देते हैं और उसे सुरत को शब्द से जोड़ने की साधना समझाते हैं।
आप बताते हैं कि मनुष्य बाहरी संसार को देखने में इतना व्यस्त रहता है कि उसे अपने भीतर की यात्रा का ध्यान ही नहीं रहता। सतगुरु उस भूले हुए मार्ग की ओर संकेत करते हैं।
इसलिए सतगुरु की शरण केवल किसी बाहरी संबंध का नाम नहीं है। यह जीव के जीवन को सही दिशा देने वाली शरण है
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-मन और सुरत एक नहीं हैं
स्वामी जी मन और सुरत के अंतर को समझाते हुए कहते हैं कि दोनों को एक समझना उचित नहीं है।
आप बताते हैं कि मन संसार की ओर खींचता है, जबकि सुरत का संबंध उस आध्यात्मिक मार्ग से है जहाँ उसे शब्द के साथ जोड़ा जाना है।
मन अलग-अलग इच्छाओं में उलझता रहता है। कभी किसी वस्तु की इच्छा करता है और कभी किसी दूसरी वस्तु की। इसी कारण मनुष्य के भीतर स्थिरता नहीं रहती।
स्वामी जी साधक को समझाते हैं कि सुरत को धीरे-धीरे बाहरी आकर्षणों से हटाकर भीतर की ओर लगाने का अभ्यास करना चाहिए।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-चार शरीर और जीव की अवस्था
स्वामी जी के प्रश्न–उत्तर में स्थूल, लिंग, सूक्ष्म और कारण शरीर की चर्चा आती है। इनके माध्यम से जीव की विभिन्न अवस्थाओं को समझाने का प्रयास किया गया है।
आप बताते हैं कि मनुष्य जिस शरीर को अपना स्वरूप समझता है, उसके पीछे भी चेतना और सुरत का संबंध है।
स्थूल शरीर पंच तत्वों से बना है। इसके साथ इंद्रियाँ और अंतःकरण काम करते हैं। आगे लिंग, सूक्ष्म और कारण शरीर की अवस्थाओं का वर्णन आता है।
आप समझाते हैं कि साधक को केवल बाहरी शरीर तक सीमित होकर नहीं रहना चाहिए। उसे अपने भीतर की चेतना को पहचानने की ओर बढ़ना चाहिए।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-सुरत की असल बैठक भीतर है
स्वामी जी के अनुसार सुरत की वास्तविक स्थिति को समझना आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण विषय है।
आप बताते हैं कि पिंड में सुरत के संबंध को तीसरे तिल, शिवनेत्र और पिंडी दसवें द्वार आदि शब्दों से समझाया गया है।
इसका उद्देश्य साधक को यह समझाना है कि आध्यात्मिक यात्रा केवल बाहरी स्थानों की यात्रा नहीं है।
यह भीतर की यात्रा है।
जब साधक का ध्यान भीतर की ओर होने लगता है, तब वह उन सूक्ष्म अवस्थाओं को समझने की दिशा में बढ़ता है जिनका वर्णन संतों ने किया है।

संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-मन को संभालना आवश्यक है
आप बताते हैं कि मन बहुत चंचल है। वह एक जगह टिकना नहीं चाहता।
मन कभी भूतकाल में चला जाता है और कभी भविष्य की चिंता करने लगता है। कभी इच्छा उसे खींचती है और कभी किसी विषय का आकर्षण।
इसीलिए साधक के लिए केवल बाहरी नियम पर्याप्त नहीं हैं।
स्वामी जी कहते हैं कि मन को साधने के लिए सत्संग, नाम-सुमिरन और भजन का सहारा लेना चाहिए।
जब सुरत भीतर की ओर लगती है तो धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने लगती है।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-मुक़ामी सुन्ने और आध्यात्मिक मुकाम
संत सत्य वचन के प्रश्न–उत्तर में अनेक आध्यात्मिक मुकामों का उल्लेख आता है। इनमें झंझरीद्वीप, सहसदल कमल, नभ, गगन, त्रिकुटी, गुरुपद, दसवाँ द्वार, मानसरोवर, सुन्न, महासुन्न, भँवरगुफा, सतलोक, अलख, अगम और अनामी जैसे नाम आते हैं।
आप बताते हैं कि साधक की अंतर यात्रा में ये अलग-अलग आध्यात्मिक अवस्थाएँ और मुकाम माने गए हैं।
इनका उद्देश्य केवल नाम याद करना नहीं है। साधक को अपने अभ्यास में भीतर की ओर बढ़ना है और सुरत को शब्द के साथ जोड़ना है।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-कठिन साधना ही सब कुछ नहीं है
स्वामी जी से पूछा गया कि क्या अष्टांग योग, हठयोग, विवेक-वैराग्य जैसी कठिन साधनाओं से जीव धुर धाम तक पहुँच सकता है?
उत्तर में धुनात्मक नाम और अंतर के मुकामों के ज्ञान को महत्वपूर्ण बताया गया है।
आप समझाते हैं कि केवल कठिन साधना करने से ही अंतिम आध्यात्मिक मंजिल प्राप्त नहीं हो जाती।
साधक को उस मार्ग की पहचान भी होनी चाहिए जिस पर वह चल रहा है।
इसीलिए संतमत में सतगुरु की शरण और उनके बताए मार्ग को विशेष महत्व दिया गया है।

संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-धुनात्मक नाम वाले महात्मा की पहचान
स्वामी जी बताते हैं कि धुनात्मक नाम वाले महात्मा की पहचान उनके अंतरमुखी और निष्पक्ष उपदेश से होती है।
आप कहते हैं कि ऐसे महात्मा जीव को केवल बाहरी बातों में नहीं उलझाते, बल्कि उसे अंतर के मार्ग की ओर ले जाते हैं।
वे विभिन्न आध्यात्मिक मुकामों और शब्द की साधना का भेद जानते हैं तथा जीव को पिंड से आगे अंड और ब्रह्मांड की ओर ले जाने वाले मार्ग को समझाते हैं।
संत सत्य वचन- पंछी, पारस और दरियाई घोड़े का उदाहरण
स्वामी जी आध्यात्मिक बातों को समझाने के लिए उदाहरणों का सहारा लेते हैं।
आप बताते हैं कि अलल पंछी संत का उदाहरण है, पारस नाम का और दरियाई घोड़ा सुमन का संकेत देता है।
इन उदाहरणों के माध्यम से साधक को यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि सही संगति, नाम और साधना जीव के जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं। प्रश्न–उत्तर में इन उदाहरणों के साथ कामधेनु गाय, कल्पवृक्ष और चमकते पत्थर जैसे उदाहरण भी आते हैं।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-सतगुरु सेवा और भजन से अंतर की सफाई होती है
आप बताते हैं कि सतगुरु की सेवा, सत्संग और भजन से साधक के भीतर की सफाई होती है।
मनुष्य के अंदर अनेक प्रकार के विचार और इच्छाएँ रहती हैं। जब वह सत्संग और भजन की ओर बढ़ता है तो उसका ध्यान धीरे-धीरे ऊपर की ओर होने लगता है।
स्वामी जी कहते हैं कि प्रेम और विरह के साथ सतगुरु की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
साधना में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। नियमितता और प्रेम आवश्यक हैं।

संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-पाँच नामों का सुमिरन और ध्यान
स्वामी जी के प्रश्न–उत्तर में पाँच नामों के सुमिरन और उनकी धुन को सुनने के विषय पर भी प्रश्न किया गया है।
आप बताते हैं कि केवल नामों को बोलना ही पर्याप्त नहीं है। साधक को गुरु के बताए मार्ग के अनुसार प्रेम और विश्वास के साथ अभ्यास करना चाहिए।
बिना पूर्ण गुरु की शरण और सही मार्गदर्शन के साधना में अपनी मनमानी करना उचित नहीं बताया गया है।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-संत चरण का ध्यान करो
स्वामी जी के वचनों में संत चरण का विशेष महत्व दिखाई देता है।
आप बताते हैं कि तीसरे तिल से लेकर सतलोक तक जिन आध्यात्मिक मुकामों का वर्णन किया गया है, उनके मार्ग को समझना और संत चरण का ध्यान करना साधक के लिए उपयोगी है।
यहाँ संत चरण केवल बाहरी रूप का विषय नहीं है।
आप कहते हैं कि संत चरण का वास्तविक भाव उस मार्ग और साधना से जुड़ा है जो जीव को परम धाम की ओर ले जाती है।
जीव, सीव और हंस का क्या अर्थ है?
स्वामी जी बताते हैं कि सुरत की स्थिति के अनुसार जीव, सीव और हंस के अलग-अलग नाम बताए गए हैं।
जब सुरत पिंड में बंधी रहती है तो उसे जीव कहा जाता है। आगे की आध्यात्मिक अवस्थाओं में अलग-अलग नामों से उसकी स्थिति समझाई जाती है।
आप समझाते हैं कि नाम बदलने का उद्देश्य केवल शब्दों का अंतर बताना नहीं है, बल्कि सुरत की आध्यात्मिक स्थिति को समझाना है।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-सच्ची मोक्ष की अवस्था क्या है?
स्वामी जी से पूछा गया कि सच्ची मोक्ष कहाँ मिलती है।
उत्तर में मानसरोवर में स्नान के बाद सुरत के फिर जन्म न लेने और शब्दरूप होने की बात कही गई है तथा सतलोक पहुँचने का वर्णन किया गया है।
आप कहते हैं कि मोक्ष का अर्थ केवल संसार से छुटकारा नहीं है। जीव की सुरत को अपने वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप की ओर लौटना है।
यही कारण है कि संतमत की साधना में सुरत और शब्द का संबंध महत्वपूर्ण माना गया है।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-संत जीव को अपनाते हैं
स्वामी जी से पूछा गया कि संत किसी जीव को कैसे अपनाते हैं।
आप बताते हैं कि जब संत जीव को नाम देते हैं तो उसकी सुरत को भीतर के मार्ग पर लगाने का प्रयास करते हैं और उसे ऊँचे मुकामों की ओर ले जाने की कृपा करते हैं।
स्वामी जी कहते हैं कि यदि किसी जीव को अपने समय का संत या साध नहीं मिला है, तो उसे ऐसे संत की तलाश करनी चाहिए जो उसे सही मार्ग दिखा सके।
यहाँ “अपनाना” केवल सांसारिक संबंध नहीं है। यह जीव को आध्यात्मिक मार्ग में स्वीकार करने और उसकी सुरत को सही दिशा देने का भाव है।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-“सतगुरु वक्त” क्या हैं?
स्वामी जी से पूछा गया कि सतगुरु वक्त किसे कहते हैं।
आप बताते हैं कि जो संत हमें मिले, जिन्होंने हमें अपनाया और जिनसे हमें उपदेश मिला, वही हमारे लिए सतगुरु वक्त हैं। शरीर का रहना या न रहना इस संबंध को समाप्त नहीं करता।
आप कहते हैं कि उनके उपदेश की कमाई प्रेम और प्रीत के साथ करते रहना चाहिए।
यह बात साधक को अपने गुरु के प्रति प्रेम, विश्वास और उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-सतलोक, अलख, अगम और अनामी को समझो
स्वामी जी आध्यात्मिक अवस्थाओं का अंतर भी समझाते हैं।
आप बताते हैं कि सतलोक के ऊपर अलख और अगम जैसे आध्यात्मिक मुकामों का वर्णन है और अनामी की भी अलग अवस्था बताई गई है।
इन नामों को केवल शब्द समझकर याद करना उद्देश्य नहीं है। साधक को उस अंतर यात्रा का भाव समझना चाहिए जिसकी ओर ये संकेत करते हैं।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-संतों की वास्तविक विश्रामगाह
स्वामी जी से संतों की विश्रामगाह और दरबार के बारे में भी पूछा गया है।
आप बताते हैं कि परम संतों की विश्रामगाह अलख, अगम और अनामी से संबंधित बताई गई है, जबकि आम दरबार सतलोक में माना गया है। अपनाए हुए जीवों के लिए संत नीचे के मुकामों तक भी आते-जाते हैं।
यहाँ भी मुख्य बात यही है कि संत का उद्देश्य अपने अपनाए हुए जीव को आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ाना है।
साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी महाराज
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं -साधना में प्रेम सबसे आवश्यक है
स्वामी जी के वचनों को पढ़ते हुए एक बात बार-बार सामने आती है—साधना केवल दिखावे की चीज नहीं है।
आप कहते हैं कि मनुष्य को अपने भीतर देखना चाहिए।
सत्संग सुनना चाहिए।
सतगुरु की शरण लेनी चाहिए।
नाम का सुमिरन करना चाहिए।
भजन का अभ्यास करना चाहिए।
मन को संसार की अनावश्यक इच्छाओं से बचाना चाहिए।
और सबसे बढ़कर अपने मार्ग पर प्रेम और विश्वास के साथ चलते रहना चाहिए।
संतों की साधना, सत्संग और अंतर की यात्रा से जुड़े विषयों को समझने के लिए पाठक Sant Mat से संबंधित आध्यात्मिक सामग्री भी देख सकते हैं।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं आज के जीवन में संत सत्य वचन का महत्व
आज मनुष्य के पास सुविधाएँ बहुत हैं, लेकिन मन की शांति कम होती जा रही है। इच्छाएँ बढ़ती जा रही हैं और मन अनेक दिशाओं में भाग रहा है।
ऐसे समय में स्वामी जी का संदेश साधक को भीतर देखने की प्रेरणा देता है।
आप कहते हैं कि संसार में अपना कर्तव्य निभाते हुए भी मनुष्य अपने भीतर की यात्रा को नहीं भूलना चाहिए।
संसार छोड़ना ही साधना नहीं है। अपने मन को समझना, अच्छे विचारों को अपनाना, सत्संग से जुड़ना और सतगुरु के बताए मार्ग पर चलना भी आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं-संत सत्य वचन का मुख्य संदेश
यदि स्वामी जी के इन वचनों को सरल शब्दों में समझें तो उनका संदेश इस प्रकार है—
मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने।
सत्संग को जीवन में स्थान दे।
सतगुरु की शरण को समझे।
नाम-सुमिरन और भजन की ओर बढ़े।
सुरत को संसार के आकर्षणों से हटाकर भीतर की ओर लगाने का प्रयास करे।
मन की चंचलता को समझे और उसे साधने का प्रयास करे।
कठिन साधना के साथ सही मार्ग और सही गुरु की आवश्यकता को समझे।
प्रेम, विश्वास और नियमित अभ्यास के साथ आध्यात्मिक जीवन जिए।
संत सत्य वचन में स्वामी जी कहते हैं अंत में एक बात
स्वामी जी कहते हैं कि मनुष्य को अपने जीवन की वास्तविक मंजिल को पहचानना चाहिए। संसार के काम करते हुए भी यदि मनुष्य को सत्संग, सतगुरु, नाम और अपनी अंतर यात्रा का स्मरण बना रहे, तो उसका जीवन एक नई दिशा प्राप्त कर सकता है।
संतों के वचन हमें बाहर से भीतर की ओर देखने की प्रेरणा देते हैं। यही वह यात्रा है जिसमें साधक धीरे-धीरे अपने मन को समझता है, सुरत को संभालता है और शब्द के मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रयास करता है।
स्वामी जी कहते हैं कि केवल वचन सुन लेना पर्याप्त नहीं है। उनके बताए मार्ग को समझकर प्रेम और विश्वास के साथ जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।”
महत्वपूर्ण सूचना
यह लेख “संत सत्य वचन” के उपलब्ध अंशों और उसमें दिए गए जीवन चरित्र तथा प्रश्न–उत्तर के आधार पर सरल, व्याख्यात्मक रूप में तैयार किया गया है। यहाँ मूल सामग्री को पूरा पुनः प्रकाशित करने के बजाय उसके आध्यात्मिक भाव को सरल भाषा में समझाया गया है।