मुक्ति दिवस 23 मार्च का वह ऐतिहासिक दिन है, जिसे बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के प्रेमी आज भी श्रद्धा और स्मरण के साथ याद करते हैं। यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि 21 महीने के संघर्ष, सहनशीलता, धैर्य, साहस और गुरु-प्रेम की कहानी से जुड़ा हुआ दिन है।
परम पूज्य बाबा जयगुरुदेव जी महाराज को आपातकाल के समय जेल में रखा गया। बाबा जी के जेल जाने के बाद उनके प्रेमियों ने जिस धैर्य और साहस का परिचय दिया, वह इस पूरे इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है।

बाबा जयगुरुदेव जी महाराज की गिरफ्तारी
आपातकाल के समय देश में राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ बहुत कठिन थीं। बाबा जयगुरुदेव जी महाराज समाज में शाकाहार, सदाचार और आध्यात्मिक जीवन का संदेश देते थे।
उस समय सरकार की नसबंदी नीति को लेकर भी देश में विरोध और असंतोष का वातावरण था। बाबा जी ने भी इस विषय में अपनी आवाज उठाई। इसके बाद परिस्थितियाँ और गंभीर होती चली गईं।
आखिरकार बाबा जयगुरुदेव जी महाराज को गिरफ्तार करके जेल में रखा गया।
बाबा जी के जेल जाने की खबर उनके प्रेमियों के लिए अत्यंत पीड़ादायक थी। लेकिन उन्होंने निराश होकर बैठने के बजाय अपने गुरु के प्रति प्रेम और विश्वास के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया।
बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के जीवन से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण प्रसंगों के लिए हमारी अभिवादन सामग्री भी पढ़ें।
मुक्ति दिवस-जेल भरो आंदोलन की शुरुआत
बाबा जी के प्रेमियों के मन में एक भावना थी कि जब उनके गुरु जेल में हैं तो वे बाहर रहकर कैसे शांत बैठ सकते हैं?
धीरे-धीरे प्रेमियों ने जेल भरो आंदोलन का रास्ता अपनाया।
पुरुषों के साथ महिलाएँ भी गिरफ्तारी देने के लिए आगे आने लगीं। ऐसी महिलाएँ भी थीं जिनकी गोद में छोटे-छोटे बच्चे थे। महीने भर के बच्चों वाली माताएँ भी जेल जाने से पीछे नहीं हटीं।
यह केवल किसी राजनीतिक आंदोलन जैसा दृश्य नहीं था। इन प्रेमियों के लिए यह अपने गुरु के प्रति प्रेम और समर्पण का विषय था।
प्रेमियों की संख्या लगातार बढ़ती गई।
जेलों में जगह कम पड़ने लगी।
मुक्ति दिवस-जब जेल का परिसर बन गया भजन घर
जब जेलों में प्रेमियों के लिए पर्याप्त जगह नहीं रही, तब जहाँ भी उन्हें रखा गया, वहाँ वे बैठकर भजन करने लगे।
जेल का परिसर मानो भजन घर बन गया।
जहाँ सामान्यतः भय और निराशा का वातावरण होना चाहिए था, वहाँ प्रेमी अपने गुरु का नाम लेकर भजन करते दिखाई देते थे।
एक ओर जेल की दीवारें थीं और दूसरी ओर प्रेमियों के हृदय में अपने गुरु के प्रति अटूट विश्वास।
प्रेमियों का आना लगातार जारी रहा।
ऐसा लगने लगा जैसे चारों ओर से लोग जनसमुद्र की तरह चले आ रहे हों।

मुक्ति दिवस-पुलिस ने दूर जंगल में छोड़ा, फिर भी प्रेमियों का हौसला नहीं टूटा
जेलों में जगह कम पड़ने के बाद कई प्रेमियों को पुलिस गिरफ्तार करके बहुत दूर ले जाती और रात के समय जंगलों में छोड़ देती।
लेकिन प्रेमी इससे डरकर वापस नहीं लौटे।
कई लोगों के साथ मारपीट भी की गई, फिर भी उनका हौसला नहीं टूटा।
वे फिर वापस आते और गिरफ्तारी देने के लिए तैयार हो जाते।
उनकी भावना थी—
“हमारे बाबाजी को छोड़ो, वरना हमको भी जेल दे दो।”
यह वाक्य उस समय के प्रेमियों की गुरु-भक्ति और साहस को समझने के लिए बहुत कुछ कह देता है।
मुक्ति दिवस-21 महीने तक चलता रहा संघर्ष
बाबा जयगुरुदेव जी महाराज का जेल में रहना लगभग 21 महीने तक चला।
इन 21 महीनों में बाबा जी के प्रेमियों ने अपने गुरु के दर्शन के बिना कठिन समय बिताया।
लेकिन उन्होंने अपने विश्वास को टूटने नहीं दिया।
यही कारण है कि “21 महीने का इतिहास” केवल जेल में बिताए गए समय का इतिहास नहीं है। यह बाबा जी की सहनशीलता और उनके प्रेमियों के धैर्य और साहस की भी कहानी है।
मुक्ति दिवस- धर्म प्रचारक संघ पर प्रतिबंध
जेल भरो आंदोलन के बीच परिस्थितियाँ और गंभीर हो गईं।
31 दिसंबर 1976 को प्रकाशित National Herald के समाचार में “J.G.D.P. Sangh Banned” शीर्षक से यह समाचार प्रकाशित हुआ।
समाचार के अनुसार लखनऊ में उत्तर प्रदेश सरकार ने जयगुरुदेव धर्म प्रचारक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था।
समाचार में Gazette notification के संबंध में लिखा गया कि सरकार इस बात से संतुष्ट थी कि संघ के सदस्य और उसके नियंत्रण में रहने वाले व्यक्ति ऐसी गतिविधियों में लगे हुए थे जिन्हें सरकार ने—
“activities prejudicial to internal security, public safety and maintenance of public order”

माना था।
इसी आधार पर Defence of Internal Security of India Rules के Rule 33 के प्रावधान जयगुरुदेव धर्म प्रचारक संघ पर लागू किए गए।
इसी समाचार में यह भी लिखा गया कि पिछले कुछ सप्ताहों में संघ के अनुयायियों को पूरे राज्य में गिरफ्तार किया गया था और पुलिस के अनुसार वे सरकार विरोधी नारे लगा रहे थे।
इस प्रकार 31 दिसंबर 1976 का यह समाचार उस समय की परिस्थितियों को समझने वाला एक महत्वपूर्ण समकालीन प्रमाण है
भारत सरकार के राजपत्र (Gazette of India) में सरकारी अधिसूचनाएँ और वैधानिक आदेश उपलब्ध हैं।
मुक्ति दिवस-प्रेमियों का धैर्य और साहस
इतने कठिन वातावरण के बावजूद बाबा जी के प्रेमियों का उत्साह कम नहीं हुआ।
गिरफ्तारी का डर, जेल की कठिनाइयाँ, पुलिस की मारपीट और दूर जंगल में छोड़ दिए जाने जैसी परिस्थितियाँ भी उनके कदम नहीं रोक सकीं।
वे अपने गुरु के प्रति प्रेम को सबसे ऊपर रखते थे।
जिन लोगों ने यह समय स्वयं देखा या सहा, उनके लिए ये 21 महीने जीवन भर की स्मृति बन गए।
वे अपने गुरु के अनमोल सत्य वचन याद करते
सरिता जी और उस समय की घटनाओं का लेखा-जोखा
इस 21 महीने के इतिहास को सुरक्षित रखने में सरिता जी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
सरिता जी बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के प्रारंभिक पाँच नामदानी प्रेमियों में से एक थीं। वे “शाकाहारी सदाचारी बालसंघ” नामक साप्ताहिक समाचार-पत्र की संपादक थीं और अपने परिवार के साथ मथुरा आश्रम में रहती थीं।
उनके पति सच्चिदानंद जी बाबा जी की ओर से पत्र-व्यवहार तथा उत्तर लिखने का कार्य करते थे।
आज सरिता जी, सच्चिदानंद जी और उनके पुत्र इस संसार में नहीं हैं, लेकिन उस समय की घटनाओं से संबंधित सामग्री और लेखन के माध्यम से उस कठिन दौर की अनेक स्मृतियाँ सुरक्षित रह गईं।
“21 महीने का इतिहास” इसी ऐतिहासिक दौर की घटनाओं को समझने में हमारे लिए महत्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करता है।
मुक्ति दिवस-23 मार्च 1977 — आया मुक्ति का दिन
आखिर वह दिन आया जिसका बाबा जी के प्रेमी लंबे समय से इंतजार कर रहे थे।
23 मार्च 1977 को बाबा जयगुरुदेव जी महाराज जेल से रिहा हुए।
21 महीने की लंबी अवधि के बाद बाबा जी के बाहर आने की खबर प्रेमियों के लिए अत्यंत आनंद और भावुकता का क्षण थी।
जिस गुरु के दर्शन के लिए प्रेमियों ने इतना लंबा इंतजार किया था, उस गुरु के जेल से बाहर आने का दिन उनके लिए वास्तव में मुक्ति का दिन बन गया।
इसीलिए 23 मार्च को “मुक्ति दिवस” के रूप में याद किया जाने लगा।

क्यों मनाया जाता है मुक्ति दिवस?
मुक्ति दिवस केवल बाबा जी की जेल से रिहाई की स्मृति नहीं है।
यह दिन याद दिलाता है—
- बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के 21 महीने के कठिन जेल जीवन को।
- उन प्रेमियों के धैर्य और साहस को।
- उन महिलाओं को जिन्होंने गिरफ्तारी देने में पीछे कदम नहीं रखा।
- उन माताओं को जो छोटे बच्चों के साथ भी संघर्ष में आगे आईं।
- उन प्रेमियों को जिन्हें पुलिस दूर जंगलों में छोड़ आई, फिर भी वे वापस आए।
- उन प्रेमियों को जिन्होंने जेल में भी भजन को नहीं छोड़ा।
- और उस ऐतिहासिक दिन को जब बाबा जी 23 मार्च 1977 को जेल से बाहर आए।
मुक्ति दिवस पर भजन और सत्संग
मुक्ति दिवस के अवसर पर बाबा जी के प्रेमी इस ऐतिहासिक दिन को श्रद्धा के साथ याद करते हैं।
इस अवसर पर बाबा जयगुरुदेव जी महाराज का स्मरण, भजन, सत्संग और उनके उपदेशों को याद किया जाता है।
यह अवसर केवल उत्सव का नहीं, बल्कि उन कठिन दिनों को याद करने का भी है जब प्रेमियों ने अपने गुरु के प्रति अपना विश्वास बनाए रखा।
मुक्ति दिवस-21 महीने हमें क्या सिखाते हैं?
बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के 21 महीने के इतिहास से सबसे बड़ी सीख धैर्य और विश्वास की मिलती है।
कठिन परिस्थिति में मनुष्य का वास्तविक साहस सामने आता है।
बाबा जी जेल में थे, लेकिन उनके प्रेमियों ने अपने विश्वास को नहीं छोड़ा।
जेल की कठिनाइयों के बीच भी भजन चलता रहा।
मारपीट और परेशानी के बाद भी प्रेमियों के कदम नहीं रुके।
यह इतिहास बताता है कि सच्ची श्रद्धा केवल सुख के समय दिखाई नहीं देती। कठिन समय में अपने विश्वास पर टिके रहना ही उसकी वास्तविक परीक्षा है।
मुक्ति दिवस- केवल एक तारीख नहीं
23 मार्च 1977 इतिहास की एक तारीख है, लेकिन बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के प्रेमियों के लिए यह उससे कहीं अधिक है।
यह दिन उन 21 महीनों की याद है जिनमें बाबा जी जेल में रहे और उनके प्रेमियों ने अपने गुरु के प्रति प्रेम, धैर्य और साहस का परिचय दिया।
यह दिन उस संघर्ष की याद है जिसमें जेलें भर गईं, जेल परिसर भजन घर बन गए और प्रेमियों का जनसमुद्र रुकने का नाम नहीं ले रहा था।
यह दिन उस प्रतीक्षा की याद है जो आखिरकार 23 मार्च 1977 की रिहाई के साथ पूरी हुई।

“21 महीने का इतिहास” — एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत
इस पूरे प्रसंग को समझने के लिए पुस्तक “21 महीने का इतिहास”, जिसका उपशीर्षक “मुक्ति दिवस का इतिहास” है, बहुत महत्वपूर्ण है।
पुस्तक में इस समय से संबंधित घटनाओं, समाचारों और सामग्री को संकलित किया गया है। इसमें उस दौर की परिस्थितियों और बाबा जी के प्रेमियों के संघर्ष की अनेक बातें सुरक्षित हैं।
यह पुस्तक बाबा जी की सहनशीलता तथा उनके प्रेमियों के धैर्य और साहस की कहानी को सामने लाती है।
मुक्ति दिवस-निष्कर्ष
मुक्ति दिवस — 23 मार्च 1977 बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है।
21 महीने तक बाबा जी जेल में रहे। इस दौरान उनके प्रेमियों ने भी कठिन परिस्थितियों का सामना किया। पुरुषों और महिलाओं ने गिरफ्तारियाँ दीं। छोटे बच्चों वाली माताएँ भी पीछे नहीं हटीं। जेलों में जगह कम पड़ी तो प्रेमियों ने वहीं भजन किया। पुलिस ने कई लोगों को दूर जंगलों में छोड़ दिया, मारपीट की, लेकिन प्रेमियों का साहस नहीं टूटा।
इसलिए मुक्ति दिवस केवल बाबा जी की रिहाई की स्मृति नहीं है; यह बाबा जी की सहनशीलता और उनके प्रेमियों के अटूट धैर्य, साहस और गुरु-प्रेम की भी स्मृति है।
जयगुरुदेव नाम प्रभु का।