साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी महाराज

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी महाराज का जीवन बचपन से ही परमात्मा की खोज और सत्य की तलाश से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। सांसारिक जीवन की सामान्य इच्छाओं के स्थान पर उनके भीतर बचपन से ही उस परम सत्य को जानने की तीव्र जिज्ञासा थी, जिसे संतों ने परमात्मा, मालिक और प्रभु के रूप में समझाया है।

उपलब्ध जीवन-साहित्य तथा बाबा जयगुरुदेव जी की हस्तलिखित डायरी में उनके जीवन की साधना, गुरु की खोज और गुरु-कृपा से जुड़े अनेक प्रसंग मिलते हैं। इन प्रसंगों से उनके जीवन की उस आध्यात्मिक यात्रा की झलक मिलती है, जिसने आगे चलकर उन्हें बाबा जयगुरुदेव के रूप में प्रसिद्ध किया।

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी-बचपन से ही परमात्मा की खोज

बाबा जयगुरुदेव जी के जीवन-वृत्तांत में वर्णित है कि बचपन से ही उनके मन में परमात्मा को प्राप्त करने की प्रेरणा थी। उनकी माता ने भी उन्हें जीवन के दो महत्वपूर्ण संदेश दिए—एक, विवाह के बंधन में न पड़ना और दूसरा, प्रभु को प्राप्त करना।

बाबा जी ने बाद में अपने जीवन के प्रसंगों को स्मरण करते हुए अपनी माता से जुड़ी इन बातों का उल्लेख किया है। यही प्रेरणा धीरे-धीरे उनके जीवन की दिशा बन गई।

समय बीतता गया, लेकिन परमात्मा की खोज समाप्त नहीं हुई। उन्होंने अनेक संतों और महात्माओं के बारे में सुना, उनसे मिलने का प्रयास किया और ऐसे महापुरुष की तलाश करते रहे जो उन्हें परमात्मा के साक्षात्कार का मार्ग बता सके।

उनकी यह खोज केवल किसी धार्मिक संस्था या बाहरी रूप की खोज नहीं थी। वे ऐसे गुरु की तलाश में थे जो स्वयं उस मार्ग को जानता हो और उन्हें उस मार्ग पर चलाकर परमात्मा की प्राप्ति करा सके।

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी-साधु-संतों की तलाश

परमात्मा की खोज में बाबा जी ने अनेक स्थानों की यात्रा की। वे संतों और महात्माओं के पास जाते, उनकी सेवा करते और उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करने का प्रयास करते।

लेकिन उन्हें वह संत नहीं मिला जिसकी उन्हें तलाश थी।

कई बार मन में निराशा उत्पन्न हुई। जीवन का उद्देश्य जैसे सामने नहीं आ रहा था। उनकी साधना और खोज इतनी तीव्र थी कि संसार का सामान्य जीवन उन्हें आकर्षित नहीं करता था।

उनकी इसी बेचैनी का वर्णन उनके जीवन से जुड़े साहित्य में मिलता है। एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि यदि परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग नहीं मिला तो जीवन का कोई अर्थ नहीं है।

इसी कठिन अवस्था में उनके जीवन में एक ऐसी प्रेरणा आई जिसने उन्हें फिर से अपनी खोज जारी रखने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने हार नहीं मानी।

वे फिर निकल पड़े—उस महापुरुष की तलाश में जो उन्हें परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग बता सके।

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी-चिरौली की ओर यात्रा

उनकी खोज अंततः अलीगढ़ जनपद के चिरौली गाँव तक पहुँची।

दादा गुरु

यहीं उनकी मुलाकात पंडित घुरेलाल शर्मा जी, जिन्हें उनके शिष्य और अनुयायी दादा गुरु के नाम से श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं, से हुई।

बाहरी दृष्टि से दादा गुरु एक साधारण ब्राह्मण परिवार में रहने वाले व्यक्ति दिखाई देते थे। लेकिन बाबा जी ने उनके भीतर वह आध्यात्मिक शक्ति और वह मार्गदर्शक स्वरूप पहचाना जिसकी उन्हें वर्षों से तलाश थी।

यही वह मोड़ था जहाँ बाबा जयगुरुदेव जी की लंबी आध्यात्मिक खोज को अपना मार्ग मिला।

अन्य स्रोतों में भी बाबा जयगुरुदेव जी की परमात्मा की खोज और चिरौली में पंडित घुरेलाल शर्मा जी से मिलने का उल्लेख मिलता है। (Jai Guru Dev)

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी-दादा गुरु से प्रथम मिलन

दादा गुरु से मिलने के बाद बाबा जी को ऐसा अनुभव हुआ कि उनकी वर्षों पुरानी तलाश पूरी होने वाली है।

जिन महापुरुष की खोज में वे स्थान-स्थान पर भटक रहे थे, वे अब उनके सामने थे।

बाबा जी ने दादा गुरु को केवल एक साधु या संत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया।

यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई।

गुरु की खोज समाप्त हुई और गुरु की सेवा तथा साधना का जीवन प्रारम्भ हुआ।

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी-गुरु की सेवा और साधना

दादा गुरु के संपर्क में आने के बाद बाबा जी ने उनके बताए मार्ग पर साधना प्रारम्भ की।

उनकी साधना सामान्य उत्सुकता वाली साधना नहीं थी। वे अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण के भाव से साधना में लगे रहे।

उनकी हस्तलिखित डायरी में साधना के अनुभवों से जुड़े प्रसंग मिलते हैं। उसमें गुरु के स्वरूप का ध्यान, साधना के दौरान मन की अवस्थाएँ तथा गुरु-कृपा से प्राप्त अनुभवों का वर्णन है।

डायरी के इन पन्नों से यह भी पता चलता है कि बाबा जी अपने गुरु के प्रति कितनी गहरी श्रद्धा रखते थे।

वे गुरु के आदेश को अपने जीवन का आधार मानते थे।

अभिवादन

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी-नामदान और साधना का मार्ग

दादा गुरु ने बाबा जी को नामदान दिया और साधना का मार्ग बताया।

इसके बाद बाबा जी ने अपने जीवन को साधना के लिए समर्पित कर दिया।

उनके जीवन-वृत्तांत में वर्णित है कि साधना उनके दैनिक जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई थी। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी साधना को नहीं छोड़ा।

उनका उद्देश्य केवल स्वयं आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करना नहीं था। वे उस मार्ग को समझना चाहते थे जिससे अन्य जीवात्माएँ भी अपने वास्तविक घर और परमात्मा की ओर लौट सकें।

बाद के उनके सत्संगों में भी नामदान, साधना, गुरु-भक्ति और आत्मिक उन्नति पर विशेष बल मिलता है। (Satguru Jai Gurudev)

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी-गुरु और शिष्य का अद्भुत संबंध

बाबा जयगुरुदेव जी और दादा गुरु का संबंध केवल गुरु और शिष्य का सामान्य संबंध नहीं था।

बाबा जी के जीवन में दादा गुरु का स्थान सर्वोच्च मार्गदर्शक का रहा। उन्होंने अपने गुरु की सेवा की, उनके आदेशों का पालन किया और साधना के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते रहे।

उनके जीवन की इस यात्रा को समझने के लिए बाबा जी की अपनी हस्तलिखित डायरी विशेष महत्व रखती है, क्योंकि उसमें साधना और गुरु से जुड़े अनुभव उनके अपने लेखन में सुरक्षित हैं।

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी

जब बाबा जयगुरुदेव जी अपने गुरु की खोज में निकले, तब वे संसार के लिए किसी बड़े आध्यात्मिक संगठन के प्रमुख नहीं थे।

वे एक साधक थे।

एक ऐसे साधक, जिसके भीतर परमात्मा को जानने की तीव्र इच्छा थी।

उन्होंने साधु-संतों की तलाश की, अनेक कठिनाइयाँ देखीं, निराशा का सामना किया और अंततः अपने गुरु दादा गुरु के चरणों तक पहुँचे।

दादा गुरु से नामदान प्राप्त करने के बाद उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य साधना और गुरु की सेवा बन गया।

यही साधना आगे चलकर उनके व्यापक आध्यात्मिक कार्य की आधारभूमि बनी।


साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी-गुरु की खोज से जन-जन तक संदेश की यात्रा

दादा गुरु के सान्निध्य में प्राप्त आध्यात्मिक शिक्षा और साधना ने बाबा जयगुरुदेव जी के जीवन को एक नई दिशा दी।

आगे चलकर उन्होंने देश के विभिन्न भागों में जाकर सत्संग किया और लोगों को शाकाहार, सदाचार, नामदान, साधना तथा आत्मिक जीवन का संदेश दिया।

उनके अनुयायी साहित्य में उन्हें “जयगुरुदेव नाम को जगाने वाले” संत के रूप में स्मरण करते हैं। (East News 24×7)

लेकिन इस व्यापक कार्य की शुरुआत बहुत पीछे, उस समय हुई थी जब एक साधक अपने भीतर उठी परमात्मा की पुकार के कारण अपने सच्चे गुरु की तलाश में निकल पड़ा था।

साधु रूप में बाबा जयगुरुदेव जी-चिरौली में दादा गुरु से मिलना उसी यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

यहीं से साधक और गुरु का संबंध स्थापित हुआ।

यहीं से नामदान और साधना का मार्ग मिला।

और यहीं से उस जीवन-यात्रा की नींव पड़ी, जिसे आगे चलकर संसार ने बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के रूप में जाना।